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संपादकीय–भारत की आत्मा और सोमनाथ का संदेश

RamParkash Vats
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भारत के अस्तित्व को मिटाने के प्रयास सदियों से होते रहे हैं, लेकिन हिमालय की तरह अडिग भारत की संस्कृति, आस्था और धर्म आज भी वैसे ही खड़े हैं। सोमनाथ मंदिर इसका सबसे जीवंत प्रमाण है—एक ऐसा प्रतीक, जिसे बार-बार तोड़ा गया, फिर भी वह हर बार और अधिक ऊँचा होकर खड़ा हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर दिया गया वक्तव्य केवल एक भाषण नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है, जिसे लंबे समय तक धुंध में रखा गया। सोमनाथ पर हुए आक्रमण केवल आर्थिक लूट नहीं थे; वे भारत की सांस्कृतिक चेतना, आस्था और आत्मविश्वास को तोड़ने के प्रयास थे। यदि उद्देश्य केवल धन होता, तो पहली बड़ी लूट के बाद यह क्रम रुक जाता। लेकिन मंदिर का बार-बार ध्वंस, पवित्र विग्रह को खंडित करना और उसके स्वरूप को मिटाने की कोशिशें इस बात का प्रमाण हैं कि यह नफरत, अत्याचार और आतंक की सुनियोजित राजनीति थी।

फिर भी इतिहास गवाह है कि जिस शिव को मृत्युंजय कहा जाता है, उसे कोई काल भी परास्त नहीं कर सकता। भारत की आस्था किसी एक संरचना में सीमित नहीं, वह कण-कण में व्याप्त है। यही कारण है कि मंदिर टूटे, लेकिन श्रद्धा नहीं टूटी; शिखर गिरे, लेकिन आत्मा नहीं झुकी। आज वही सोमनाथ समुद्र तट पर धर्मध्वजा थामे खड़ा है और घोषणा कर रहा है कि समय के थपेड़े भी सत्य और आस्था को मिटा नहीं सकते।

दुर्भाग्य यह रहा कि स्वतंत्रता के बाद भी गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त कुछ वर्गों ने इस प्रतिरोध और पुनर्निर्माण के इतिहास को वह सम्मान नहीं दिया, जिसका वह हकदार था। वीर हमीरजी गोहिल, वेगड़ा भील, रावल कान्हड़देव जैसे नायकों के बलिदान और संघर्ष को हाशिये पर रखा गया, जबकि आक्रमणकारियों के कृत्यों को ‘साधारण लूट’ बताकर इतिहास को ‘व्हाइट वॉश’ करने की कोशिशें होती रहीं। तुष्टीकरण की राजनीति ने कट्टरपंथी सोच के सामने बार-बार घुटने टेके।

सोमनाथ का पुनर्निर्माण सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प का परिणाम था। तब भी विरोध हुए, आपत्तियाँ उठीं, लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान के आगे वे टिक नहीं सकीं। जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने दिखाया कि जब राष्ट्र और संस्कृति का प्रश्न हो, तब निजी स्वार्थ और राजनीतिक संकोच पीछे छूट जाते हैं।

आज सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की निरंतरता, प्रतिरोध और पुनर्जन्म की गाथा है। यह हमें याद दिलाता है कि सभ्यताएँ तलवार से नहीं मिटतीं और आस्था को इतिहास की धूल में नहीं दबाया जा सकता। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व अतीत का स्मरण मात्र नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी और प्रेरणा है—कि अपनी पहचान को जानना, मानना और सहेजना ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।

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