बार-बार गैस सिलेंडरों के फटने की घटनाओं से न केवल लोगों की जान जाती है, बल्कि भारी आर्थिक नुकसान भी होता है। इसके बावजूद इन हादसों को अक्सर मामूली घटनाएं मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कुछ दिनों की चर्चा के बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और जिम्मेदार विभाग गहरी नींद में सोए नजर आते हैं। न तो ठोस जांच होती है, न ही स्थायी सुधार के कदम उठाए जाते हैं। परिणामस्वरूप वही लापरवाही दोहराई जाती है और हर बार इसकी कीमत निर्दोष लोगों को अपनी जान और संपत्ति से चुकानी पड़ती है।

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असुरक्षित भंडारण, आमंत्रित हादसा:बड़े-बड़े होटलों, दुकानों और बहुमंजिला घरों में गैस सिलेंडरों को जहां-तहां रखना एक खतरनाक लापरवाही है, जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रसोई या उपयोग स्थल से अलग, हवादार और सुरक्षित स्थान पर सिलेंडर रखना अनिवार्य होना चाहिए, क्योंकि बंद और भीड़भाड़ वाले कमरों में रखा सिलेंडर जरा-सी चूक पर बड़े विस्फोट का कारण बन सकता है। यह केवल उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संबंधित विभागों का भी कर्तव्य है कि वे नियमित निरीक्षण करें और सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराएं। जब तक होटल, दुकान और घरों में गैस भंडारण को लेकर स्पष्ट नियम और प्रभावी निगरानी नहीं होगी, तब तक हर इमारत एक संभावित हादसे का केंद्र बनी रहेगी। अब समय आ गया है कि विभाग चेतावनी नहीं, ठोस कार्रवाई करे
गैस सिलेंडर फटने से लगने वाली आग केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि शहरी और ग्रामीण जीवन की सुरक्षा पर गहरी चोट है। यह आग इतनी भयावह इसलिए होती है क्योंकि रसोई गैस (एलपीजी) अत्यधिक ज्वलनशील होती है और थोड़ी-सी चूक पूरे घर, दुकान या इमारत को पलभर में राख में बदल सकती है। सिलेंडर के भीतर गैस दबाव में रहती है; जैसे ही रिसाव, ओवरहीटिंग या तकनीकी खराबी होती है, आग और विस्फोट की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
एलपीजी हवा से भारी होती है। रिसाव होने पर गैस नीचे जमती जाती है और एक छोटी-सी चिंगारी—जैसे माचिस, स्विच या फ्रिज का स्टार्ट—भयानक धमाके में बदल जाती है। सिलेंडर के फटते ही आग की तेज़ लपटें, शॉक वेव और ऊष्मा आसपास की दीवारों, छतों और संरचनाओं को कमजोर कर देती हैं। यही कारण है कि ऐसे हादसों में जान-माल का भारी नुकसान, इमारतों का ढहना और दूर-दूर तक आग फैलना आम बात है।इस तरह की आग का सामाजिक असर भी गंभीर होता है। परिवार उजड़ जाते हैं, आजीविका छिन जाती है और इलाके में लंबे समय तक भय बना रहता है। घनी बस्तियों में यह खतरा और बढ़ जाता है, जहां संकरी गलियां, अव्यवस्थित वायरिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आग को विकराल बना देती है।
गैस सिलेंडर की एक्सपायरी कैसे पहचानें:ग्रामीण और शहरी इलाकों में रसोई गैस का इस्तेमाल हर घर में हो रहा है, लेकिन अधिकतर लोग यह नहीं जानते कि गैस सिलेंडर की भी एक्सपायरी होती है। समय सीमा खत्म होने वाला सिलेंडर इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है। इसलिए हर उपभोक्ता को सिलेंडर की एक्सपायरी देखना जरूरी है।गैस सिलेंडर के ऊपरी हिस्से, जहां हैंडल होता है, वहां अंग्रेजी अक्षर A, B, C या D के साथ एक साल लिखा होता है। यही सिलेंडर की वैधता बताता है।
इसका मतलब इस प्रकार है:-A लिखा हो तो सिलेंडर जनवरी से मार्च तक वैध रहता है।——B का अर्थ है अप्रैल से जून——C का मतलब जुलाई से सितंबर——–D लिखा हो तो सिलेंडर अक्टूबर से दिसंबर तक मान्य होता है।********उदाहरण के तौर पर, अगर सिलेंडर पर D-26 लिखा है, तो वह सिलेंडर अक्टूबर से दिसंबर 2026 तक इस्तेमाल के लिए सुरक्षित माना जाता है।गैस एजेंसियों को समय-सीमा के भीतर ही सिलेंडर देने के निर्देश हैं, फिर भी उपभोक्ताओं को खुद जांच करनी चाहिए। अगर एक्सपायरी निकली हुई हो, तो उसे तुरंत गैस एजेंसी को लौटाना चाहिए।जानकारों का कहना है कि थोड़ी सी सावधानी बड़े हादसे से बचा सकती है। इसलिए सिलेंडर लेते समय उसकी एक्सपायरी जरूर देखें और सुरक्षित रसोई का ध्यान रखें।
सिलेंडर की सुरक्षा, उसकी जांच और मानकों की निगरानी की जिम्मेदारी पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) के पास होती है, जो केंद्र सरकार के अंतर्गत कार्य करता है और सिलेंडर, गैस गोदामों, परिवहन तथा सुरक्षा से जुड़े सभी नियम तय करता है। वहीं किसी आग या दुर्घटना की स्थिति में राज्य स्तर पर अग्निशमन विभाग और जिला प्रशासन राहत व बचाव कार्य करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो गैस सिलेंडर केंद्र सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन आता है, जबकि उसकी सुरक्षा निगरानी PESO द्वारा की जाती है

