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नशे के सौदागर, मुकरते गवाह और मौन समाज: न्याय प्रणाली की सीमाएं, व्यवस्था की चूक, पंचायतों की चुप्पी और युवाओं के भविष्य पर मंडराता खतरनाक नशे का स्याह संकट आज

RamParkash Vats
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Editorial Viewpoint: Brainstorming and Analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

राज्य लीगल सर्विस अथॉरिटी, जिला लीगल सर्विस अथॉरिटी कांगड़ा तथा उपमंडल लीगल सर्विस अथॉरिटी ज्वाली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मेगा लीगल सर्विस कैंप केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह समाज के सामने खड़े नशे जैसे विकराल संकट पर सामूहिक आत्ममंथन का मंच बनकर उभरा। वक्ताओं की चिंता महज शब्दों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समाज को झकझोर देने वाली सच्चाई का आईना थी।

नशे के खिलाफ कार्रवाई में सबसे बड़ी कमजोर कड़ी गवाह व्यवस्था बनती जा रही है। नशे की छोटी या बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत गवाहों पर निर्भर रहती है। पंचायत प्रधान, पंच या मौके पर मौजूद आम नागरिकों को प्रत्यक्षदर्शी बनाया जाता है। किंतु विडंबना यह है कि यही गवाह अदालत में पहुंचते-पहुंचते मुकर जाते हैं और नशे के सौदागर कानूनी खामियों का लाभ उठाकर छूट जाते हैं। एक न्यायाधीश द्वारा व्यक्त की गई यह चिंता समाज की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि न्यायालय गवाहों के आधार पर निर्णय देता है, और जब गवाह ही पलट जाएं तो न्याय कैसे सुनिश्चित हो?

दूसरी ओर, भारतीय न्याय प्रणाली का नैतिक सिद्धांत—कि सौ अपराधी भले छूट जाएं, पर एक निर्दोष को सजा न हो—अपराधियों के लिए एक मजबूत ढाल बनता जा रहा है। यह सिद्धांत न्याय का आधार है, किंतु नशे जैसे संगठित अपराध में इसका दुरुपयोग गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

समाधान क्या हो?
जब घुमंतू नशा तस्कर भागते हुए पकड़े जाते हैं, नशे की थैली फेंक देते हैं और मौके पर कोई गवाह उपलब्ध नहीं होता, तब पारंपरिक जांच पद्धति विफल हो जाती है। ऐसे में सरकार और विभागों को ठोस, आधुनिक समाधान खोजने होंगे। प्रत्येक थाने में प्रशिक्षित स्निफर डॉग्स की तैनाती, तकनीकी साक्ष्यों का व्यापक उपयोग और अकस्मात, निरंतर रेड व्यवस्था को अनिवार्य करना समय की मांग है।

इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि नशे के सौदागरों को ऑक्सीजन कहां से मिल रही है—राजनीतिक संरक्षण, पुलिस की कार्यप्रणाली की कमजोरियां, कानून का लचीलापन या समाज की चुप्पी? इसका उत्तर केवल व्यवस्था में नहीं, बल्कि जनता के व्यवहार में भी छिपा है। नशामुक्त समाज का नारा आज मजाक बनकर रह गया है। पंचायत स्तर पर शराब, भांग, चिट्टा और स्मैक सहज उपलब्ध हैं। जिन पंचायतों में 20-30 नशा विक्रेताओं पर मुकदमे चल रहे हैं, वहीं के युवा इस दलदल में धकेले जा रहे हैं। इसके बावजूद बुद्धिजीवी, पंचायतें, महिला मंडल और स्वयंसेवी संस्थाएं आंखों पर पट्टी बांधे बैठी हैं।

परिणाम सामने है—युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति और अकाल मृत्यु का तांडव। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि दोषी कौन है, बल्कि यह कि हम सब कहां चूक रहे हैं। सरकार, विभाग और जनता—तीनों को यह स्वीकार करना होगा कि हम खाई के मुहाने पर खड़े हैं। अब भी यदि सामूहिक आत्ममंथन और निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

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