संपादकीय दृष्टि कोण चिंतन मंथन और विश्लेषण
वास्तविक हकीकत यही है कि नशे के सामने आज शासन-प्रशासन अक्सर लाचार और बेबस दिखाई देता है। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि तंत्र की सामूहिक कमजोरी को उजागर करती है। ऐसे में इस विषय पर गंभीर चिंतन-मंथन और ठोस समाधान तलाशना समय की अनिवार्यता बन चुका है।

नशों से समाज को मुक्त करने का सबसे सरल और प्रभावी तरीका यही है कि नशा सौदागरों की गतिविधियों की समय पर सूचना मिले और उस पर निर्भीक कार्रवाई हो। परंतु व्यवहार में यह व्यवस्था लगातार फेल होती दिख रही है। पंचायत स्तर पर पुलिस द्वारा बिछाया गया तथाकथित गुप्त सूत्रों का जाल अब गोपनीय नहीं रहा। जिन पर निगरानी की जिम्मेदारी है, उनकी पहचान सबको मालूम है और नशा माफिया उनकी हर हरकत से पहले ही वाकिफ रहता है।
इसका परिणाम यह है कि आम नागरिक भय, असुरक्षा और हमले के डर में जीता है। सूचना देने से पहले ही उसे यह आशंका सताती है कि कहीं उसकी पहचान लीक न हो जाए। नशा सौदागरों की राजनीतिक और प्रशासनिक पहुंच इतनी गहरी है कि वे कानून को चुनौती देने से भी नहीं हिचकते। पकड़े जाने पर गवाह सामने आने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि ये लोग किसी को भी यमराज के घर पहुंचाने से नहीं डरते।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि नशों से जुड़े विभागों का ढांचा खुद जर्जर हो चुका है। इनका कायाकल्प अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। सूचना देने वालों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए प्रदेश स्तर पर एक स्वतंत्र और अत्यंत सुरक्षित विंग का गठन जरूरी है, ताकि मुखबिर और सूचनादाता स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर सकें।
अक्सर जब नशे के क्रेता-विक्रेता पकड़े जाते हैं, तो जब्त किए गए सामान की मात्रा और जानकारी भी संदेह के घेरे में रहती है। यह स्थिति कहीं न कहीं अपराधियों को प्रोत्साहित करती प्रतीत होती है। समाज को इस दलदल में धकेलने के लिए पब, बड़े होटल, रेव पार्टियां और यहां तक कि शिक्षा संस्थान भी निशाने पर हैं, जहां भविष्य की पीढ़ी को धीरे-धीरे जहर दिया जा रहा है।
जब तक सरकार पारदर्शिता, प्रशासन ईमानदारी और जनता को सुरक्षा की ठोस गारंटी नहीं देगी, तब तक नशा रूपी मृत्यु का देवता अकाल मौत बांटता रहेगा और अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ता जाएगा। अब समय आ गया है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल कागजों और अभियानों तक सीमित न रखकर, जमीन पर ईमानदारी और साहस के साथ उतारा जाए—वरना इसका खामियाजा पूरा समाज चुकाता रहेगा।

