Reading: “हिमाचल में प्रकृति का प्रहार: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों की अनदेखी, अवैध निर्माण-खनन और प्रशासनिक लापरवाही से बढ़ता ecological संकट—पर्वत बार-बार कह रहा है, ‘मुझसे पंगा मत लो’।”

“हिमाचल में प्रकृति का प्रहार: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों की अनदेखी, अवैध निर्माण-खनन और प्रशासनिक लापरवाही से बढ़ता ecological संकट—पर्वत बार-बार कह रहा है, ‘मुझसे पंगा मत लो’।”

RamParkash Vats
8 Min Read
संपादकीय चिंतन, मंथन, विश्लेषण :संपादक राम प्रकाश वत्स
Contents
समय की चेतावनी और उसकी अनदेखी का मूल्य:-प्रकृति बोलती नहीं, संकेत देती है — और समय चेतावनी देकर विवेक की परीक्षा लेता है। किंतु जब शासन व्यवस्था और समाज उन संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते, तब आपदा केवल संभावित नहीं रहती, बल्कि अपरिहार्य बन जाती है। पिछले वर्षों में बदलते मौसम पैटर्न, अतिवृष्टि, भूस्खलन घटनाओं में वृद्धि तथा नदियों के जलस्तर में अचानक उतार-चढ़ाव हिमाचल को आसन्न खतरे की ओर संकेत कर रहे थे। वैज्ञानिक संस्थाएँ लगातार आगाह कर रही थीं कि अस्थिर ढलानों पर निर्माण, लगातार वन-क्षरण, तथा पर्वतीय नदियों में तटोद्धार के नाम पर अत्यधिक खुदाई हिमालय की स्थिरता को नष्ट कर रही है। परंतु इन चेतावनियों पर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर वैसी तत्परता नहीं दिखाई गई जैसी अपेक्षित थी। नतीजा यह कि इस वर्ष की आपदाएँ आकस्मिक नहीं थीं — वे केवल समय पर ध्यान न देने का मूल्य थीं। जब प्रकृति खुद कह रही थी कि “सीमा पार मत करो”, तब हमने उसी सीमा को बार-बार लांघा और अब इसकी भरपाई जन-हानि, आजीविका हानि और लंबी आर्थिक क्षति के रूप में सामने है।दुखदायी मौनसून के पाँच मुख्य कारण:-वर्ष 2025 का मौनसून हिमाचल के लिए केवल भारी बारिश का मौसम नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रशासनिक परीक्षा साबित हुआ—और दुर्भाग्य से हम इस परीक्षा में विफल रहे। सबसे पहला कारण था अत्यधिक और अनियमित वर्षा, जिसने नाजुक भूभाग पर दवाब बढ़ाया। लेकिन असली कमजोरी नीतिगत और संस्थागत स्तर पर रही। सरकार समय पर जोखिम-आकलन आधारित निर्माण नीतियाँ लागू न कर सकी। खनन विभाग की कमज़ोरी ने तटों की संरचनात्मक स्थिरता को तोड़ा; मशीनरी आधारित खनन ने नदी-धाराओं को कृत्रिम रूप से असंतुलित किया। प्रशासनिक ढाँचा आपदा-पूर्व तैयारी, सामुदायिक चेतावनी प्रणाली और राहत के समन्वय में पिछड़ा रहा। जनता की तरफ़ से भी पर्यावरणीय अनुशासन का अभाव रहा — नदियों के किनारे अनधिकृत निर्माण, पहाड़ियों की ढलानों पर गलत डिज़ाइन वाले भवन और अवैध गतिविधियों में स्थानीय स्तर पर सहयोग भी आपदा को बढ़ाने वाला तत्व रहा। इस प्रकार, इस वर्ष की त्रासदी प्राकृतिक से अधिक मानव-निर्मित थी — जिसमें नीतियों की कमी, निगरानी की कमजोरी और सामूहिक अनदेखी ने विनाश को अनिवार्य बना दिया।क्या विशेष आपदा मंत्रालय की आवश्यकता है?लगातार आती आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमाचल के लिए पारंपरिक Chemistry ढांचा पर्याप्त नहीं है। यह प्रदेश वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला, बहु-विषयक और एकीकृत निर्णय लेने वाला “राज्य आपदा एवं पर्यावरण संरक्षा मंत्रालय” स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। ऐसा मंत्रालय राहत-केंद्रित न होकर, पूर्व-आपदा प्रबंधन, भू-जोखिम मानचित्रण, सतत विकास, निर्माण कोड सुधार, खनन नियमन, पर्यावरणीय निगरानी और पर्वतीय सड़क नियोजन जैसी जिम्मेदारियों को एक केंद्रीकृत ढाँचे में संभाले। अभी निर्णय कई विभागों में बिखरे हुए हैं — और यही बिखराव जमीनी क्रियान्वयन को कमजोर करता है। एक एकीकृत मंत्रालय विशेषज्ञों, भू-विज्ञानियों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों को जोड़कर एक सुसंगत नीति ढांचा बना सकता है। यह मंत्रालय तभी प्रभावी होगा जब इसे वित्तीय स्वायत्तता, आपदा कोष, तकनीकी उपकरण और कानूनी अधिकार दिए जाएँ। यह कदम हिमाचल जैसे संवेदनशील राज्य के लिए विलासिता नहीं — बल्कि समय की आवश्यकता है।बदलता भूगोल और भविष्य की कड़ी चेतावनी:-हिमाचल का भूगोल स्थिर नहीं है—यह जीवित, चलायमान और अत्यंत संवेदनशील भू-प्रणाली है। यदि वर्तमान की तरह अवैध निर्माण, अनियंत्रित खनन और अवैज्ञानिक विकास मॉडल जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में नदियों की धाराएँ बदल जाएँगी, घाटियों का प्राकृतिक आकार विकृत होगा और कई क्षेत्रों का जोखिम स्तर दोगुना हो जाएगा। अनेक भू-विज्ञान रिपोर्टें पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि हिमाचल का लगभग 45% हिस्सा भूस्खलन जोखिम वाले क्षेत्रों में आ चुका है। बार-बार आपदाओं का मतलब केवल भौगोलिक नुकसान नहीं — पर्यटन, कृषि, उद्योग, सड़कें, और गांवों का अस्तित्व भी प्रभावित होगा। यह प्रदेश आर्थिक रूप से पीछे धकेला जा सकता है, और इसका सामाजिक ढांचा भी टूट सकता है। इसलिए आज की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी यही है कि यह लड़ाई सिर्फ सरकार की नहीं — नागरिकों, समुदायों और नीति-निर्माताओं की संयुक्त जिम्मेदारी है। प्रकृति अपना संदेश बार-बार दोहरा रही है: “मुझसे पंगा मत लो, वरना मैं बदल जाऊँगी—और तुम उसका भार नहीं उठा पाओगे।

हिमाचल प्रदेश में हाल में आई प्राकृतिक आपदाओं से हुआ भारी नुकसान आज भी लगभग ज्यों का त्यों बना हुआ है। कई गाँव पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं, सड़कें अधूरी पड़ी हैं Arya पहाड़ी ढलानों की दरारें आज भी खतरे का संकेत दे रही हैं। हिमाचल का मौसम कब करवट बदल ले, इसका अनुमान लगाना कठिन है—और यही अनिश्चितता इस संकट को और गंभीर बना देती है। यहाँ का हर बदलाव केवल भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि मानवता और प्रकृति दोनों से जुड़ा हुआ मसला है। पहाड़ों की संवेदनशीलता और लोगों की आजीविका दोनों दांव पर लगी हैं। ऐसे में केवल प्रदेश सरकार की कोशिशें पर्याप्त नहीं मानी जा सकतीं। केंद्र सरकार को स्वयं आगे बढ़कर पुनर्निर्माण, पुनर्वास और दीर्घकालिक पर्यावरण-सुरक्षा के लिए विशेष सहायता पैकेज जारी करना चाहिए, ताकि हिमाचल न केवल वर्तमान संकट से उबर सके, बल्कि भविष्य की आपदाओं के प्रति अधिक सक्षम और सुरक्षित बन सके।

न्यायालय की चेतावनी और सरकार की जवाबदेही :-हिमाचल प्रदेश आज जिस आपदा-चक्र में उलझा हुआ है, वह किसी प्राकृतिक विडंबना का परिणाम मात्र नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही नीति-त्रुटियों और प्रशासनिक ढिलाई का दुष्परिणाम है। सुप्रीम कोर्ट ने अनियंत्रित निर्माण, अवैध खनन, तथा पर्यावरणीय संतुलन के बिगड़ने पर कई बार कठोर टिप्पणियाँ की थीं। अदालत का स्पष्ट रुख यह रहा है कि हिमालयी राज्यों को अपने विकास मॉडल को पारिस्थितिक संवेदनशीलता के अनुरूप बदलना होगा, क्योंकि हिमालय की नाजुक बनावट को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित होगा। लेकिन ग्राउंड स्तर पर न तो निर्माण-कोड सख्ती से लागू हुए, न खनन पर निर्णायक नियंत्रण हुआ, और न ही जोखिम-प्रबंधन को प्राथमिकता मिली। सरकार का यह दायित्व था कि वह चेतावनियों को नीति-निर्माण में उतारे — मगर दुर्भाग्य से यह जिम्मेदारी लगातार कमजोर पड़ी और इसका खामियाज़ा आज पूरा प्रदेश भुगत रहा है। यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब सर्वोच्च अदालत बार-बार कह रही हो, तब लापरवाही केवल चूक नहीं, बल्कि जवाबदेही का गंभीर संकट बन जाती है।

समय की चेतावनी और उसकी अनदेखी का मूल्य:-प्रकृति बोलती नहीं, संकेत देती है — और समय चेतावनी देकर विवेक की परीक्षा लेता है। किंतु जब शासन व्यवस्था और समाज उन संकेतों को गंभीरता से नहीं लेते, तब आपदा केवल संभावित नहीं रहती, बल्कि अपरिहार्य बन जाती है। पिछले वर्षों में बदलते मौसम पैटर्न, अतिवृष्टि, भूस्खलन घटनाओं में वृद्धि तथा नदियों के जलस्तर में अचानक उतार-चढ़ाव हिमाचल को आसन्न खतरे की ओर संकेत कर रहे थे। वैज्ञानिक संस्थाएँ लगातार आगाह कर रही थीं कि अस्थिर ढलानों पर निर्माण, लगातार वन-क्षरण, तथा पर्वतीय नदियों में तटोद्धार के नाम पर अत्यधिक खुदाई हिमालय की स्थिरता को नष्ट कर रही है। परंतु इन चेतावनियों पर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर वैसी तत्परता नहीं दिखाई गई जैसी अपेक्षित थी। नतीजा यह कि इस वर्ष की आपदाएँ आकस्मिक नहीं थीं — वे केवल समय पर ध्यान न देने का मूल्य थीं। जब प्रकृति खुद कह रही थी कि “सीमा पार मत करो”, तब हमने उसी सीमा को बार-बार लांघा और अब इसकी भरपाई जन-हानि, आजीविका हानि और लंबी आर्थिक क्षति के रूप में सामने है।

दुखदायी मौनसून के पाँच मुख्य कारण:-वर्ष 2025 का मौनसून हिमाचल के लिए केवल भारी बारिश का मौसम नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रशासनिक परीक्षा साबित हुआ—और दुर्भाग्य से हम इस परीक्षा में विफल रहे। सबसे पहला कारण था अत्यधिक और अनियमित वर्षा, जिसने नाजुक भूभाग पर दवाब बढ़ाया। लेकिन असली कमजोरी नीतिगत और संस्थागत स्तर पर रही। सरकार समय पर जोखिम-आकलन आधारित निर्माण नीतियाँ लागू न कर सकी। खनन विभाग की कमज़ोरी ने तटों की संरचनात्मक स्थिरता को तोड़ा; मशीनरी आधारित खनन ने नदी-धाराओं को कृत्रिम रूप से असंतुलित किया। प्रशासनिक ढाँचा आपदा-पूर्व तैयारी, सामुदायिक चेतावनी प्रणाली और राहत के समन्वय में पिछड़ा रहा। जनता की तरफ़ से भी पर्यावरणीय अनुशासन का अभाव रहा — नदियों के किनारे अनधिकृत निर्माण, पहाड़ियों की ढलानों पर गलत डिज़ाइन वाले भवन और अवैध गतिविधियों में स्थानीय स्तर पर सहयोग भी आपदा को बढ़ाने वाला तत्व रहा। इस प्रकार, इस वर्ष की त्रासदी प्राकृतिक से अधिक मानव-निर्मित थी — जिसमें नीतियों की कमी, निगरानी की कमजोरी और सामूहिक अनदेखी ने विनाश को अनिवार्य बना दिया।

क्या विशेष आपदा मंत्रालय की आवश्यकता है?लगातार आती आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमाचल के लिए पारंपरिक Chemistry ढांचा पर्याप्त नहीं है। यह प्रदेश वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला, बहु-विषयक और एकीकृत निर्णय लेने वाला “राज्य आपदा एवं पर्यावरण संरक्षा मंत्रालय” स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। ऐसा मंत्रालय राहत-केंद्रित न होकर, पूर्व-आपदा प्रबंधन, भू-जोखिम मानचित्रण, सतत विकास, निर्माण कोड सुधार, खनन नियमन, पर्यावरणीय निगरानी और पर्वतीय सड़क नियोजन जैसी जिम्मेदारियों को एक केंद्रीकृत ढाँचे में संभाले। अभी निर्णय कई विभागों में बिखरे हुए हैं — और यही बिखराव जमीनी क्रियान्वयन को कमजोर करता है। एक एकीकृत मंत्रालय विशेषज्ञों, भू-विज्ञानियों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों को जोड़कर एक सुसंगत नीति ढांचा बना सकता है। यह मंत्रालय तभी प्रभावी होगा जब इसे वित्तीय स्वायत्तता, आपदा कोष, तकनीकी उपकरण और कानूनी अधिकार दिए जाएँ। यह कदम हिमाचल जैसे संवेदनशील राज्य के लिए विलासिता नहीं — बल्कि समय की आवश्यकता है।

बदलता भूगोल और भविष्य की कड़ी चेतावनी:-हिमाचल का भूगोल स्थिर नहीं है—यह जीवित, चलायमान और अत्यंत संवेदनशील भू-प्रणाली है। यदि वर्तमान की तरह अवैध निर्माण, अनियंत्रित खनन और अवैज्ञानिक विकास मॉडल जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में नदियों की धाराएँ बदल जाएँगी, घाटियों का प्राकृतिक आकार विकृत होगा और कई क्षेत्रों का जोखिम स्तर दोगुना हो जाएगा। अनेक भू-विज्ञान रिपोर्टें पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि हिमाचल का लगभग 45% हिस्सा भूस्खलन जोखिम वाले क्षेत्रों में आ चुका है। बार-बार आपदाओं का मतलब केवल भौगोलिक नुकसान नहीं — पर्यटन, कृषि, उद्योग, सड़कें, और गांवों का अस्तित्व भी प्रभावित होगा। यह प्रदेश आर्थिक रूप से पीछे धकेला जा सकता है, और इसका सामाजिक ढांचा भी टूट सकता है। इसलिए आज की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी यही है कि यह लड़ाई सिर्फ सरकार की नहीं — नागरिकों, समुदायों और नीति-निर्माताओं की संयुक्त जिम्मेदारी है। प्रकृति अपना संदेश बार-बार दोहरा रही है: “मुझसे पंगा मत लो, वरना मैं बदल जाऊँगी—और तुम उसका भार नहीं उठा पाओगे।

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!