धाराबाहिक (20) भारत के स्वतंत्र सैनानी बाबा राम सिंह लेखिक संपादक राम प्रकाश वत्स
बाबा राम सिंह: स्वाभिमान और असहयोग के अग्रदूतभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने बंदूक नहीं उठाई, परंतु अपने विचारों और संगठन शक्ति से साम्राज्यवाद की नींव हिला दी। ऐसा ही तेजस्वी व्यक्तित्व थे बाबा राम सिंह (1816–1885) — महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और नामधारी (कूका) आंदोलन के संस्थापक।
पंजाब की पवित्र धरती पर जन्मे बाबा राम सिंह ने 12 अप्रैल 1857 को लुधियाना के भैणी साहिब से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असहयोग का शंखनाद किया। यह वही समय था जब देश में 1857 की क्रांति की चिंगारी सुलग रही थी। उन्होंने विदेशी वस्त्रों और अंग्रेजी संस्थाओं के बहिष्कार का आह्वान किया। उनके अनुयायी सफेद वस्त्र और पगड़ी धारण करते थे तथा कीर्तन के समय भावविभोर होकर ‘कूका’ पुकारते थे, इसी कारण वे ‘कूका’ कहलाए।
नामधारी आंदोलन की स्थापना और दर्शन
1857 में बाबा राम सिंह ने नामधारी पंथ की स्थापना की। यह पंथ गुरु गोविंद सिंह के खालसा सिद्धांतों से प्रेरित था। उन्होंने सादा जीवन, उच्च विचार, नाम-सिमरन और ईश्वर भक्ति को जीवन का आधार बनाया। उनका विश्वास था कि आध्यात्मिक जागरण के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।
पहला संगठित असहयोग आंदोलन
बाबा राम सिंह का आंदोलन भारत का प्रथम सविनय अवज्ञा आंदोलन माना जाता है। उन्होंने अंग्रेजों की शिक्षा व्यवस्था, डाक प्रणाली, न्यायालयों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया। उनके अनुयायियों ने सरकारी संस्थाओं से दूरी बनाई और स्वदेशी जीवनशैली अपनाई। बाद में यही विचारधारा महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का आधार बनी।
सामाजिक सुधार के पुरोधा
बाबा राम सिंह केवल राजनीतिक योद्धा नहीं थे, वे समाज सुधार के महान अग्रदूत भी थे। उन्होंने जातिवाद, बाल विवाह और पर्दा प्रथा का कठोर विरोध किया। महिला सशक्तिकरण के लिए उन्होंने स्त्रियों को धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी का अवसर दिया। वे गोहत्या के घोर विरोधी थे और इसे भारतीय संस्कृति पर आघात मानते थे।
कूका आंदोलन और अंग्रेजी दमन
नामधारी अनुयायियों का गोहत्या के विरोध में संघर्ष अंग्रेजों को असहज करता था। 1872 में मालेरकोटला में हुए कूका विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन ने अमानवीय दमन किया। 65 से अधिक नामधारियों को तोपों के सामने बांधकर उड़ा दिया गया। यह घटना ब्रिटिश क्रूरता का भयावह उदाहरण बन गई।अंततः अंग्रेजों ने बाबा राम सिंह को गिरफ्तार कर पहले इलाहाबाद और फिर 1872 में रंगून (बर्मा) निर्वासित कर दिया। लंबा निर्वासन झेलते हुए 29 नवंबर 1885 को बर्मा की जेल में उनका देहावसान हुआ। परंतु उनके विचार और संघर्ष जीवित रहे।
बाबा राम सिंह ने भारतीयों को स्वाभिमान, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का मार्ग दिखाया। उन्होंने सिखाया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक जागरण का परिणाम है। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि संगठित समाज और अडिग विश्वास किसी भी साम्राज्य से अधिक शक्तिशाली होते हैं।वास्तव में, बाबा राम सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस उज्ज्वल सितारे हैं, जिनकी ज्योति ने आने वाली पीढ़ियों को आज़ादी की राह दिखाई।

