हिमाचल की जनता देख रही है—कौन अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा है और कौन केवल मंच से संवाद कर रहा है।हिमाचल प्रदेश की राजनीति इन दिनों जिस मुद्दे के इर्द-गिर्द घूम रही है, वह केवल दलगत टकराव का विषय नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक संरचना से जुड़ा मूल प्रश्न है—16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को बंद किए जाने की संभावनाएँ। मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक ने इस बहस को औपचारिक रूप दिया, परंतु बैठक के दौरान और उसके बाद जिस तरह की बयानबाज़ी हुई, उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक प्रश्नों पर राजनीतिक अविश्वास कितना गहरा है।
संवैधानिक अधिकार बनाम राजनीतिक आरोप
मुख्यमंत्री का तर्क है कि अनुच्छेद 275(1) के तहत राजस्व घाटा अनुदान राज्यों का संवैधानिक अधिकार है, जो 1952 से वित्तीय असंतुलन को दूर करने का साधन रहा है। उनका कहना है कि पूर्व भाजपा सरकार को लगभग 54,000 करोड़ रुपये आरडीजी और 16,000 करोड़ रुपये जीएसटी मुआवजे के रूप में मिले, जबकि वर्तमान सरकार को अब तक लगभग 17,000 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं। यह आंकड़े केवल तुलना भर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी हैं—कि केंद्र और राज्य के रिश्तों में संतुलन जरूरी है।
परंतु विपक्ष के नेता Jairam Thakur इसे मुख्यमंत्री की “अस्पष्ट रणनीति” करार देते हैं। उनका आरोप है कि बार-बार बैठक बुलाना और केंद्र के प्रति टकराव का स्वर अपनाना समाधान नहीं है। भाजपा का बैठक से बीच में उठ जाना राजनीतिक असहमति का संकेत तो है, किंतु क्या यह रणनीतिक दबाव की राजनीति है या संवाद से परहेज़—यह प्रश्न अनुत्तरित है।
क्या यह समय सियासत का है….?
आर्थिक आत्मनिर्भरता बनाम अनुदान पर निर्भरता
यह भी एक कठोर सत्य है कि लंबे समय तक अनुदानों पर निर्भर रहना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। राज्य सरकार आत्मनिर्भरता की दिशा में वित्तीय प्रबंधन और संसाधन सृजन की बात कर रही है, परंतु पहाड़ी राज्यों की संरचनात्मक सीमाएँ—सीमित उद्योग, परिवहन लागत, और आपदा जोखिम—उन्हें विशेष सहायता की आवश्यकता की श्रेणी में रखती हैं।
इस संदर्भ में सवाल केवल इतना नहीं कि केंद्र अनुदान दे या न दे, बल्कि यह है कि क्या 16वां वित्त आयोग विशेष श्रेणी राज्यों की वास्तविक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व दे रहा है? यदि हिमाचल की वित्तीय चुनौतियाँ विशिष्ट हैं, तो समाधान भी विशिष्ट होना चाहिए।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा
राजस्व घाटा अनुदान का मुद्दा आने वाले समय में हिमाचल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। मुख्यमंत्री सुक्खू इसे प्रदेश के अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रही है। सच यह है कि जनता को बयानबाज़ी नहीं, ठोस परिणाम चाहिए।
यह समय एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि एक साझा ज्ञापन, संयुक्त प्रतिनिधिमंडल और ठोस वित्तीय तर्कों के साथ केंद्र के सामने हिमाचल की स्थिति रखने का है। यदि राजनीतिक दल अपने मतभेदों से ऊपर उठकर राज्य के हित में एकजुट नहीं होते, तो इतिहास उन्हें कठोर दृष्टि से देखेगा।

