Reading: धर्मेंद्र: एक जीवन–गाथा का शांत अंतिम अध्याय, आज पवन हंस श्मशान घाट की राख में सिर्फ एक शरीर विलीन हुआ है—पर “ही-मैन” की आत्मा हमेशा भारतीय सिनेमा के आसमान में चमकती रहेगी।

धर्मेंद्र: एक जीवन–गाथा का शांत अंतिम अध्याय, आज पवन हंस श्मशान घाट की राख में सिर्फ एक शरीर विलीन हुआ है—पर “ही-मैन” की आत्मा हमेशा भारतीय सिनेमा के आसमान में चमकती रहेगी।

RamParkash Vats
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न्यूज इंडिया आजतक/24/11/2025/राम प्रकाश वत्स

धर्मेंद्र: एक जीवन–गाथा का शांत अंतिम अध्याय

बॉलीवुड के अमर ही-मैन, लाखों दिलों की धड़कन और भारतीय सिनेमा की विरासत धर्मेंद्र आज इस दुनिया को अलविदा कह गए। बरसों से अपने घर पर चल रहे उपचार के बीच उनका शरीर थक गया, पर आत्मा जैसे अंतिम क्षणों तक अपनी अदम्य रोशनी से जगमगाती रही। 12 नवंबर की सुबह जब उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली थी, परिवार ने उम्मीदों के दिए फिर से जला दिए थे। 8 दिसंबर को उनके 90वें जन्मदिन की तैयारियाँ भी घर में हल्के-हल्के शुरू हो रही थीं—पर नियति ने जैसे समय को उलट दिया। जन्मदिन से महज़ चौदह दिन पहले, वह सितारा जिसने 300 से अधिक फिल्मों से भारतीय सिनेमा का आसमान रोशन रखा, शांत भाव से इस दुनिया से विदा हो गया।

अंतिम संस्कार: मौन में भरी श्रद्धा का एक दीप

धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार मुंबई के विले पार्ले स्थित पवन हंस श्मशान घाट में किया गया। वातावरण में न तो कोई कोलाहल था, न भीड़ की होड़—बस एक मौन, जिसमें उनके चाहने वालों की भावनाएँ धीमे-धीमे गूँज रही थीं। बड़ी गरिमा के साथ सनी देओल ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। आग की लपटों में एक पिता का संघर्ष, एक कलाकार की चमक, और एक इंसान की सरलता जैसे एक साथ आकाश में विलीन हो रही थी।

अमिताभ बच्चन, सलमान खान, आमिर खान, अक्षय कुमार सहित फ़िल्म जगत के दिग्गज कलाकार वहाँ उपस्थित थे। हर किसी की आँखों में नमक था, पर चेहरे पर वही आदर—जो धर्मेंद्र ने दशकों की मेहनत, ईमानदारी और सौम्य व्यवहार से कमाया था। अंतिम यात्रा किसी भव्य आयोजन जैसी नहीं थी, बल्कि एक शांत, सादगीपूर्ण विदाई—जैसे स्वयं धर्मेंद्र का व्यक्तित्व रहा।

जीवन का सफ़र: पंजाब की मिट्टी से हिंदी सिनेमा का ही-मैन

8 दिसंबर 1935 को पंजाब के साहनेवाल में जन्मा यह बालक कभी नहीं जानता था कि वह भारतीय सिनेमा की सबसे लंबी और चमकदार यात्राओं में से एक का हिस्सा बनेगा। 1960 में ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से शुरू हुई उनकी राह ने उन्हें इतनी ऊँचाइयाँ दीं कि वे पाँच दशकों तक बॉलीवुड के सबसे प्रिय सितारों में गिने जाते रहे। ‘आई मिलन की बेला’, ‘फूल और पत्थर’, ‘आए दिन बहार के’ से लेकर ‘शोले’, ‘धरमवीर’, ‘चुपके-चुपके’, ‘मेरा गाँव मेरा देश’—उनकी हर फिल्म ने लोगों के दिलों में एक अलग कोना बना लिया।

उनकी मुस्कान में सहज अपनापन था, आँखों में सादगी की चमक, और व्यक्तित्व में जनता का नायक बनने की सहज ऊर्जा। शायद यही कारण है कि उन्हें ‘ही-मैन’ कहा गया—और वह यह दर्जा आखिरी सांस तक निभाते रहे।

बीमारी, संघर्ष और अफवाहों के बीच एक दृढ़ आत्मा

अक्टूबर के अंत से ही धर्मेंद्र की सेहत गिर रही थी। सांस लेने में बढ़ती परेशानी ने उन्हें अस्पताल पहुँचा दिया। 10 नवंबर को हालत गंभीर होने की खबरें आने लगीं। परिवार और फ़िल्मी जगत के लोग—सलमान, शाहरुख, गोविंदा—सभी अस्पताल पहुँचे। फिर अचानक सोशल मीडिया पर उनके निधन की अफवाहें फैल गईं। हेमा मालिनी, ईशा देओल और सनी देओल ने स्वयं आकर उन अफवाहों को गलत बताया। उस समय उम्मीदों की लौ फिर से जली, पर आज वही लौ श्रद्धांजलियों की मृदु ज्योति में बदल चुकी है।

अभिनय की अंतिम छाप: जाने से पहले भी काम अधूरा न छोड़ा

धर्मेंद्र ने उम्र की सीमाओं को कभी अपने जीवन या कला पर हावी नहीं होने दिया। 89 वर्ष की उम्र में भी वे कैमरे के सामने उसी रोशनी से भर उठते थे, जैसी शुरुआत के दिनों में हुआ करती थी। शाहिद कपूर–कृति सेनन की फिल्म ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ में उनकी उपस्थिति को दर्शकों ने बेहद सराहा। अब उनकी अंतिम फिल्म “इक्कीस”, जिसमें वे अगस्त्य नंदा के पिता की भूमिका निभाते दिखेंगे, 25 दिसंबर 2025 को रिलीज होगी—एक ऐसी तारीख जब दर्शक उन्हें एक बार फिर पर्दे पर जीवित महसूस करेंगे।

पारिवारिक जीवन: प्रेम, जटिलताएँ और रिश्तों की गहराई

धर्मेंद्र का निजी जीवन भी उतना ही चर्चित रहा। पहली पत्नी प्रकाश कौर से उनके चार बच्चे—सनी, बॉबी, विजेता और अजीता—हैं। बाद में उन्होंने हेमा मालिनी से विवाह किया, जिनसे उन्हें ईशा और अहाना देओल हुईं। रिश्तों की जटिलता के बावजूद, धर्मेंद्र का दिल हमेशा अपने परिवारों के लिए खुला रहा—एक पिता के रूप में, एक साथी के रूप में और एक मार्गदर्शक के रूप में।

एक युग का अंत, पर एक रोशनी का आरंभ

धर्मेंद्र का जाना केवल एक अभिनेता की विदाई नहीं है—यह भारतीय सिनेमा के एक पूरे युग का शांत समापन है। लेकिन उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़, उनके संवाद, उनकी वीरता और उनकी सरलता—ये सब हमारी स्मृतियों में उसी तरह जिंदा रहेंगे, जैसे किसी शांत शाम में अचानक कोई पुराना गीत कानों में उतर आए।

आज पवन हंस श्मशान घाट की राख में सिर्फ एक शरीर विलीन हुआ है—पर “ही-मैन” की आत्मा हमेशा भारतीय सिनेमा के आसमान में चमकती रहेगी।

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