संपादकीय दृष्टिकोण चिंतन मंथन और विश्लेषण:संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश की राजनीति लंबे अरसे से जिस असमंजस और प्रतीक्षा के दौर से गुजर रही थी, वह अब समाप्त हो चुका है। कांग्रेस हाईकमान ने आखिरकार प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति कर दी है और यह निर्णय सिर्फ पद परिवर्तन नहीं, बल्कि हिमाचल की जातीय, सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों में एक बड़े बदलाव का संकेत है। पूर्व डिप्टी स्पीकर व रेणुका जी के विधायक विनय कुमार को कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने हिमाचल में अपनी रणनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले विनय कुमार का चयन, आने वाले वर्षों के राजनीतिक संदेशों के लिहाज से विशेष महत्व रखता है।
यह नियुक्ति कई स्तरों पर विश्लेषण की मांग करती है
पहला, संगठनात्मक मजबूती का सवाल; दूसरा, जातीय-सामाजिक संतुलन; और तीसरा, नेतृत्व की दिशा व मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की राजनीतिक धुरी का विस्तार। विनय कुमार पहले प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी रह चुके हैं और संगठन में उनकी पकड़ मजबूत रही है। लेकिन इस बार की नियुक्ति इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे डिप्टी स्पीकर पद से इस्तीफा देकर संगठन की पूर्ण जिम्मेदारी संभालने पहुंचे हैं—यह संकेत है कि पार्टी अब संगठनात्मक पुनर्गठन को प्राथमिकता देते हुए मैदान में उतर रही है।
सत्तारूढ़ सरकार बनाम संगठन का संतुलन
पिछले दो वर्षों में कांग्रेस सरकार नेतृत्व को लेकर कई तरह की चर्चाएँ रहीं—मुख्यमंत्री सुक्खू और पूर्व अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के बीच खींचतान ने कई बार पार्टी को असहज स्थिति में खड़ा किया। प्रतिभा सिंह, जिनका संबंध हिमाचल के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक घराने—वीरभद्र सिंह परिवार—से है, 2021 से प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष थीं और 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के समय वे ही संगठन की कमान संभाल रही थीं। ऐसे में उनका पद छोड़ना या बदला जाना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक मीमांसा के दायरे में आता है।
सुक्खू और प्रतिभा सिंह—दोनों का राजपूत समाज से होना भी समीकरणों को रोचक बनाता था। लेकिन संगठन अब एक ऐसे चेहरे की तलाश में था जो न सिर्फ दोनों धड़ों को जोड़ सके बल्कि आगामी चुनावों और बदलते सामाजिक समीकरणों को भी साध सके। यही वजह है कि 25.22 फीसदी आबादी वाले अनुसूचित जाति समुदाय से विनय कुमार को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने बेहद रणनीतिक दांव खेला है।
जातीय राजनीति का नया अध्याय
हिमाचल में लंबे समय से राजपूत और ब्राह्मण नेतृत्व ही मुख्य धुरी रहा है। अनुसूचित जाति समुदाय का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम दिखाई देता था। लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव परिणामों और बदलते सामाजिक विमर्श ने कांग्रेस को यह संदेश दिया कि सामाजिक संतुलन के बिना संगठन की जड़ें मजबूत नहीं हो सकतीं। विनय कुमार का अध्यक्ष बनना इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस अब हिमाचल की जातीय गणित को नए सिरे से पढ़ रही है।इस नियुक्ति के व्यापक सामाजिक संदेश को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता—यह अनुसूचित जाति समुदाय को मुख्यधारा नेतृत्व में आगे लाने का प्रयास है। आने वाले चुनावों में यह कारक निर्णायक साबित हो सकता है।
वीरभद्र परिवार और नई कांग्रेस का समीकरण
प्रतिभा सिंह का अध्यक्ष पद से हटना, चाहे स्वाभाविक प्रक्रिया हो या राजनीतिक संतुलन, पर इसका प्रभाव पार्टी के आंतरिक ढांचे पर पड़ेगा। प्रतिभा सिंह की लोकप्रियता और संगठन में उनकी पकड़ अब भी बनी हुई है। दूसरी ओर, उनका बेटा विक्रमादित्य सिंह पहले से ही सरकार में मंत्री हैं, हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में मंडी से मिली हार ने परिवार की राजनीतिक स्थिति को थोड़ा चुनौतीपूर्ण बना दिया था। ऐसे समय में संगठन की कमान विनय कुमार को देना कांग्रेस के अंदर नई धारा के उदय का संकेत है—एक ऐसी धारा जो पारंपरिक गुटबाजी से बाहर निकलकर कार्यकर्ता-आधारित नेतृत्व को तरजीह दे रही है।
सुक्खू सरकार की रणनीति और भविष्य का रोडमैप
मुख्यमंत्री सुक्खू ने विनय कुमार को बधाई देते हुए संगठन और सरकार के बीच तालमेल की बात कही है। यह बयान सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले दिनों की दिशा तय करने का संकेत है। यदि संगठन और सरकार एक स्वर में काम करें, तो कांग्रेस हिमाचल में अपना राजनीतिक आधार मजबूत कर सकती है। विनय कुमार और सुक्खू की निकटता को भी राजनीतिक विश्लेषक एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं—ऐसा संकेत जो कांग्रेस को आंतरिक कलह से दूर ले जा सकता है।
क्या यह उलटफेर कांग्रेस की वापसी की शुरुआत है?
हिमाचल कांग्रेस में यह बदलाव सिर्फ चेहरों का परिवर्तन नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ है। विनय कुमार के रूप में कांग्रेस ने एक युवा, सक्रिय, जमीन से जुड़े और संगठनात्मक रूप से अनुभवी नेतृत्व को चुना है। यह निर्णय आने वाले समय में कांग्रेस के लिए अवसर भी बन सकता है और चुनौती भी—अवसर इसलिए कि जातीय-सामाजिक संतुलन की दिशा में यह बड़ा कदम है; चुनौती इसलिए कि संगठन और सरकार का तालमेल ही इसे सफल बना पाएगा।फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हो चुका है, जिसकी गूंज आने वाले चुनावों से लेकर सत्ता-संगठन के संबंधों तक दूर तक सुनाई देगी।

