
भारत के स्वतंत्र सैनानियों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
स्वतंत्रता की उस ज्योति में, जब भारत की धरती पर पराधीनता का अंधकार गहराया था, तब पंजाब की पावन मिट्टी से एक संत-योद्धा का उदय हुआ—राम सिंह। वर्ष 1816 में भैनी ग्राम में जन्मे इस महान आत्मा ने केवल धर्म ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना को भी जागृत किया। वे पहले भारतीयों में थे जिन्होंने असहयोग और विदेशी शासन के बहिष्कार को एक सशक्त राजनीतिक अस्त्र बनाया, और अपने जीवन को मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया।युवावस्था में ही वे संत बालक सिंह के सान्निध्य में आए, जहाँ उन्होंने भक्ति, अनुशासन और राष्ट्रधर्म का ज्ञान प्राप्त किया। नामधारी आंदोलन की पवित्र धारा में बहते हुए उन्होंने सिख गुरुओं और खालसा की गौरवगाथा को आत्मसात किया। अपने गुरु के देहावसान के पश्चात जब उन्हें नेतृत्व सौंपा गया, तब उन्होंने केवल धर्म का नहीं, बल्कि जनमानस के स्वाभिमान का भी ध्वज उठाया।एक साधारण किसान परिवार में जन्मे इस वीर ने 20 वर्ष की आयु में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में प्रवेश लिया। परंतु जैसे ही रणजीत सिंह का देहावसान हुआ और सिख साम्राज्य बिखरने लगा, राम सिंह के हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला और भी प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने समाज को फिर से आत्मसम्मान और स्वाधीनता के पथ पर अग्रसर करेंगे।उन्होंने नामधारी संप्रदाय में एक नई चेतना का संचार किया—सादगी, शुचिता और स्वदेशी का। उनके अनुयायी सफेद खादी वस्त्र धारण करते, आत्मसंयम का पालन करते और विदेशी वस्तुओं का त्याग करते थे। ब्रिटिश डाक और सेवाओं का बहिष्कार कर उन्होंने अपनी स्वतंत्र व्यवस्था खड़ी की। यह केवल धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि स्वराज्य की पहली सुनियोजित पुकार थी, जिसने आगे चलकर पूरे देश को प्रेरित किया।सन् 1863 में उन्होंने एक महान संकल्प लिया—अमृतसर की पावन धरती पर एकत्र होकर नई खालसा शक्ति का उदय करना। परंतु अंग्रेजी शासन उनकी बढ़ती शक्ति से भयभीत हो उठा और उन्हें उनके ही गाँव में नजरबंद कर दिया। समय के साथ जब उनके स्वप्नों को बाधाएँ मिलीं, तब कुछ अनुयायियों में असंतोष भी पनपा, जिसने कई हिंसक घटनाओं को जन्म दिया।जनवरी 1872 का वह भयावह समय भारतीय इतिहास में काले अक्षरों में अंकित है, जब मलेरकोटला में हुए संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कूका विद्रोहियों पर अमानवीय अत्याचार किए। निर्दोषों को तोपों के मुंह से बांधकर उड़ा दिया गया—यह दृश्य केवल शरीरों का नहीं, बल्कि मानवता का भी चीरहरण था। अंततः राम सिंह को निर्वासन में म्यांमार भेज दिया गया, जहाँ 1885 में उनका शरीर भले ही शांत हो गया, पर उनकी क्रांति की ज्योति आज भी स्वतंत्रता के आकाश में प्रज्वलित है।

