SANKETIC PHOTO
BHARMAR 17 APRIL 2026 Head Office Himachal News Desk Editor Ram Parkash Vats
हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के उपमंडल फतेहपुर की पंचायत लारथ में उठी आवाज केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि यह हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी एक गंभीर और लंबे समय से चली आ रही मूलभूत समस्या है। पठानकोट–जोगिंदर नगर रेलवे लाइन, जो विकास और संपर्क का माध्यम मानी जाती है, आज इसी क्षेत्र के लोगों के लिए एक स्थायी परेशानी और असहजता का कारण बन चुकी है। यह रेलवे लाइन मानो लोगों की “लाइफ लाइन” को ही दो हिस्सों में बांट रही है, जिससे जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
करीब 50 वर्षों से यह मुद्दा लगातार बना हुआ है, लेकिन समाधान के नाम पर केवल आश्वासन ही मिले हैं। लारथ के आसपास लगभग 20 गांव बसे हुए हैं, जो पूर्णतः पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं। इन गांवों के हजारों लोग अपनी छोटी से छोटी जरूरतों—जैसे अस्पताल, बाजार, स्कूल, बैंक या अन्य जरूरी सेवाओं—के लिए इस रेलवे लाइन को पार करने को मजबूर हैं। लेकिन रेलवे विभाग द्वारा लगाए गए अवरोध और सख्त नियमों के कारण यह पार करना बेहद जोखिम भरा और कठिन हो जाता है, खासकर जब वाहन लेकर जाना हो तो समस्या और भी बढ़ जाती है।
यह स्थिति न केवल असुविधाजनक है, बल्कि कई बार जानलेवा भी साबित हो सकती है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को रोजाना इस खतरे का सामना करना पड़ता है। कई बार आपातकालीन स्थितियों में भी लोगों को समय पर मदद नहीं मिल पाती, क्योंकि रेलवे लाइन एक बड़ी बाधा बनकर खड़ी रहती है। इससे लोगों के मन में भय, असुरक्षा और प्रशासन के प्रति गहरा असंतोष पनप रहा है।
धार्मिक दृष्टि से भी यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। शक्तिपीठ माता कोटे वाली के मंदिर में हर साल हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से होकर दर्शन के लिए जाते हैं। लेकिन रेलवे लाइन पर उचित व्यवस्था न होने के कारण श्रद्धालुओं को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि बाहरी आगंतुकों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
इसी गंभीर समस्या को लेकर हाल ही में लारथ में एक सामूहिक बैठक आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न पंचायतों के प्रतिनिधियों और क्षेत्र के प्रमुख लोगों ने भाग लिया। बैठक में इस मुद्दे पर गहन चर्चा हुई और यह निर्णय लिया गया कि यदि जल्द ही रेलवे फाटक, ओवरब्रिज या अंडरब्रिज का निर्माण नहीं किया गया, तो क्षेत्र के लोगों का जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। लोगों ने एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करने और संघर्ष को तेज करने की रणनीति भी बनाई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार धरना-प्रदर्शन कर अपनी मांगों को उठाया, लेकिन रेलवे विभाग ने हर बार उनकी अनदेखी की। वहीं, राजनीतिक स्तर पर भी केवल वादे और आश्वासन ही मिले हैं। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही दलों के नेताओं ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया और केवल औपचारिकता निभाई है।
अब लोगों का धैर्य जवाब दे रहा है। उनका मानना है कि यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह असंतोष एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले सकता है। यह केवल एक बुनियादी सुविधा की मांग नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।

