हिमाचल के लिए केंद्र-राज्य संबंधों की असली कसौटी ‘सहकारी संघवाद’ है
हिमाचल प्रदेश में 7 अक्टूबर 2026 का राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य एक साथ कई महत्वपूर्ण संकेत दे रहा है। एक ओर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का हिमाचल दौरा राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजनाओं के संदर्भ में रेखांकित कर रहा है, तो दूसरी ओर केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय संसाधनों को लेकर उठते सवाल यह याद दिला रहे हैं कि विकास केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि समय पर धन, स्पष्ट जिम्मेदारी और प्रभावी समन्वय से पूरा होता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 6 से 8 अक्टूबर तक हिमाचल प्रदेश के दौरे पर हैं। 6 अक्टूबर को उन्होंने बिलासपुर स्थित एम्स के प्रथम दीक्षांत समारोह में हिस्सा लिया और 7 अक्टूबर को अटल टनल, रोहतांग का दौरा उनके कार्यक्रम में शामिल है। राष्ट्रपति सचिवालय के अनुसार अटल टनल का दौरा 7 अक्टूबर के कार्यक्रम का हिस्सा है।
एम्स बिलासपुर का विस्तार हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए केवल एक चिकित्सा संस्थान की स्थापना का विषय नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि राष्ट्रीय स्तर के निवेश और संस्थागत क्षमता का लाभ दुर्गम क्षेत्रों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है। राष्ट्रपति ने भी एम्स बिलासपुर के दीक्षांत समारोह में दूरदराज और वंचित क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर जोर दिया।
लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू वित्तीय संघवाद से जुड़ा है।
केंद्र-राज्य संबंध केवल राजनीतिक बहस नहीं, वित्तीय साझेदारी भी हैं
मंडी के कांगणीधार स्थित न्यायिक परिसर के लिए अतिरिक्त केंद्रीय सहायता का मामला इस समय इसी बड़े प्रश्न को सामने लाता है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की कार्यवाही में केंद्र के कानून एवं न्याय मंत्रालय को पक्षकार बनाया गया है। राज्य सरकार ने अतिरिक्त धनराशि की मांग किए जाने की बात अदालत के समक्ष रखी, जबकि केंद्र की ओर से यह बताया गया कि 2026-27 के लिए हिमाचल को केंद्रीय प्रायोजित योजना के तहत 5.195 करोड़ रुपये की मदर सैंक्शन जारी की गई थी और आगे की राशि निर्धारित प्रक्रिया तथा पूर्व स्वीकृत परियोजनाओं के उपयोग के आधार पर देखी जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को निर्धारित है।
यहां संपादकीय प्रश्न यह नहीं है कि केंद्र सही है या राज्य। असली प्रश्न यह है कि क्या केंद्र और राज्य के बीच ऐसी वित्तीय व्यवस्थाएं इतनी स्पष्ट और पूर्वानुमेय हैं कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजनाएं धन के इंतजार में न रुकें?
केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में संसद में बताया था कि जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों के बुनियादी ढांचे के लिए संचालित केंद्रीय प्रायोजित योजना के तहत हिमाचल प्रदेश को पिछले वर्षों में केंद्रीय धनराशि जारी की गई है। 2026-27 के लिए हिमाचल को 5.195 करोड़ रुपये की मदर सैंक्शन का भी उल्लेख किया गया था।
यानी व्यवस्था मौजूद है, धन का प्रावधान भी है और परियोजनाओं की पहचान की प्रक्रिया भी निर्धारित है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी बड़ी परियोजना की वास्तविक लागत और उपलब्ध केंद्रीय सहायता के बीच अंतर बढ़ जाता है।
यहीं सहकारी संघवाद की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
सहकारी संघवाद का अर्थ केवल बैठकें नहीं
भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के बंटवारे की संस्थागत व्यवस्था निर्धारित करता है। अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग को केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे तथा राज्यों को अनुदान के सिद्धांतों पर सिफारिश करने की जिम्मेदारी दी गई है।
15वें वित्त आयोग ने भी अपने दस्तावेज में वित्तीय संघवाद को ‘सहकारी संघवाद’ की भावना से जोड़ते हुए केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के संतुलन तथा जिम्मेदारियों के समन्वय पर जोर दिया था। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि अनेक सार्वजनिक सेवाओं में केंद्र और राज्य दोनों की साझा भूमिका होती है।
इसलिए हिमाचल जैसे विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में केंद्र-राज्य संबंधों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। पहाड़ों में सड़क, पुल, अस्पताल, न्यायिक परिसर, जलविद्युत परियोजनाएं, आपदा प्रबंधन और संचार ढांचा मैदानी राज्यों की तुलना में अधिक महंगा और जटिल हो सकता है।
ऐसे में वित्तीय संघवाद का सवाल केवल ‘कितना पैसा मिला’ तक सीमित नहीं रह सकता। सवाल यह भी होना चाहिए कि धन किस सूत्र से मिला, किस समय मिला, राज्य का हिस्सा कितना है, परियोजना की वास्तविक लागत क्या है और धन के उपयोग की निगरानी कैसे हो रही है।
राजनीतिक टकराव से ऊपर उठने की जरूरत
हिमाचल में राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों की प्रतिध्वनि भी दिखाई दे रही है। 7 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की हिरासत के विरोध में शिमला में लोक भवन घेराव का कार्यक्रम घोषित किया गया था।
राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार है। लेकिन हिमाचल की जनता के लिए राजनीतिक सक्रियता की उपयोगिता तब अधिक होगी, जब राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ राज्य के अपने आर्थिक और प्रशासनिक सवाल भी उतनी ही मजबूती से उठाए जाएं।
क्योंकि हिमाचल के सामने सड़क, रोजगार, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, आपदा पुनर्वास और सरकारी संस्थानों के बुनियादी ढांचे जैसे प्रश्न रोजमर्रा की वास्तविकता हैं।
केंद्र से धन मांगना राज्य सरकार का अधिकार और दायित्व है। वहीं केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि पात्र योजनाओं के लिए निर्धारित प्रक्रिया के भीतर राज्यों को समयबद्ध मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग उपलब्ध हो। इसके साथ राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है कि परियोजनाओं के प्रस्ताव, उपयोगिता प्रमाणपत्र, भूमि, स्वीकृतियां और उपयोग की गई राशि का रिकॉर्ड समय पर और पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत करे।
सहकारी संघवाद में अधिकार के साथ जवाबदेही दोनों तरफ होती है।न्यायपालिका का हस्तक्षेप भी एक संकेत
पार्वती-II से जुड़े जल रिसाव और मलबे से हुए नुकसान के मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा राज्य प्रशासन से हलफनामा मांगा जाना भी इसी जवाबदेही के व्यापक प्रश्न से जुड़ता है। अदालत के समक्ष यह बताया गया कि प्रभावित क्षेत्र में नुकसान की जांच के लिए प्रशासन पहले ही एक समिति गठित कर चुका है, जबकि राज्य का जवाब अभी अदालत में प्रस्तुत किया जाना था।
न्यायपालिका का काम प्रशासन चलाना नहीं है। लेकिन जब सार्वजनिक परियोजनाओं, पर्यावरणीय जोखिमों या नागरिकों की संपत्ति और सुरक्षा से जुड़े सवाल उठते हैं, तब न्यायिक निगरानी प्रशासन को रिकॉर्ड पर जवाब देने के लिए बाध्य करती है।
यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण संतुलन है—सरकार नीति बनाए, प्रशासन उसे लागू करे और संस्थाएं उसकी वैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित करें।
हिमाचल को चाहिए ‘टकराव नहीं, स्पष्टता’
आज हिमाचल के लिए सबसे जरूरी बहस यह नहीं कि केंद्र और राज्य में किसकी राजनीतिक बात भारी है। जरूरी सवाल यह है कि दोनों स्तरों की सरकारें मिलकर नागरिकों को बेहतर परिणाम कैसे दें।
यदि किसी परियोजना के लिए केंद्र और राज्य दोनों की वित्तीय हिस्सेदारी आवश्यक है तो समयबद्ध तंत्र होना चाहिए। यदि परियोजना की लागत बढ़ती है तो संशोधित वित्तीय व्यवस्था पर तत्काल निर्णय होना चाहिए। यदि राज्य की ओर से उपयोगिता या प्रशासनिक औपचारिकताओं में कमी है तो उसे भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
इसी पारदर्शिता से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की जगह नीति आधारित संवाद विकसित होगा।
हिमाचल को केंद्र से सहयोग चाहिए, लेकिन सहयोग का अर्थ असीमित वित्तीय निर्भरता नहीं है। राज्य को अपनी आय, व्यय, ऋण और परियोजनाओं की प्राथमिकताओं पर भी कठोर वित्तीय अनुशासन कायम करना होगा। दूसरी ओर केंद्र को भी हिमालयी राज्यों की भौगोलिक, पर्यावरणीय और आपदा-संवेदनशील परिस्थितियों को वित्तीय नीति में पर्याप्त महत्व देना होगा।
श्रेय से बड़ी है साझेदारी
राष्ट्रपति का हिमाचल दौरा, एम्स बिलासपुर जैसी राष्ट्रीय परियोजनाएं, अटल टनल जैसी सामरिक आधारभूत संरचना, मंडी न्यायिक परिसर का वित्तीय विवाद और हाईकोर्ट की प्रशासनिक जवाबदेही—ये सभी अलग-अलग घटनाएं दिखाई देती हैं, लेकिन इनके भीतर एक साझा प्रश्न छिपा है:
क्या शासन का मॉडल केंद्र और राज्य के बीच प्रतिस्पर्धा का होगा या साझेदारी का?
हिमाचल की जनता को राजनीतिक श्रेय की लड़ाई से अधिक समय पर पूरा होने वाले विकास कार्य चाहिए। उसे यह जानने का अधिकार है कि किसी परियोजना के लिए पैसा कहां से आया, कितना आया, कितना खर्च हुआ और काम कब पूरा होगा।
इसलिए आने वाले समय में केंद्र और सुक्खू सरकार—दोनों के लिए सबसे उपयोगी रास्ता आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि पारदर्शी वित्तीय संवाद, समयबद्ध निर्णय और जवाबदेह सहकारी संघवाद होना चाहिए।
देवभूमि हिमाचल के विकास की असली तस्वीर तभी बनेगी, जब दिल्ली और शिमला के बीच राजनीतिक दूरी चाहे जितनी हो, विकास की योजनाओं के बीच प्रशासनिक दूरी न हो।क्योंकि संघवाद की सफलता सत्ता के बंटवारे में नहीं, जिम्मेदारी के साझा निर्वहन में दिखाई देती है।

