शिमला। हिमाचल प्रदेश में मानसून के बीच बांधों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने गुरुवार को विधानसभा में बांधों की सुरक्षा से संबंधित रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में जांचे गए 15 बांधों में से तीन बांधों में ऐसी संरचनात्मक कमियां पाई गई हैं, जिन्हें Category-II के अंतर्गत रखा गया है।Category-II का मतलब ऐसी प्रमुख कमियों से है, जिनके लिए समयबद्ध और प्राथमिकता के आधार पर सुधारात्मक कार्रवाई जरूरी होती है। राष्ट्रीय बांध सुरक्षा व्यवस्था के तहत बांधों की प्री-मानसून और पोस्ट-मानसून जांच की जाती है। कमियों की गंभीरता के आधार पर बांधों को विभिन्न श्रेणियों में रखा जाता है।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल प्रदेश भौगोलिक रूप से पहाड़ी राज्य है और यहां भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन तथा अचानक बढ़ने वाले जलप्रवाह जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।बांध की संरचनात्मक सुरक्षा में केवल मुख्य बांध की मजबूती ही शामिल नहीं होती, बल्कि स्पिलवे, गेट, जल निकासी व्यवस्था, नींव, ढलान, सीपेज, निगरानी उपकरण और अन्य सहायक संरचनाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनमें किसी तरह की कमजोरी पाए जाने पर समय रहते उसकी तकनीकी जांच और मरम्मत जरूरी हो जाती है।
देश में लागू बांध सुरक्षा व्यवस्था के तहत बांध मालिकों को नियमित निरीक्षण, रखरखाव, मरम्मत, आपातकालीन कार्ययोजना और जोखिम आकलन जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करनी होती हैं।हिमाचल के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश में बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं और जलाशय हैं। केंद्र सरकार की Dam Rehabilitation and Im provement Project यानी DRIP के तहत भी बांधों की संरचनात्मक एवं परिचालन सुरक्षा में सुधार के लिए कार्य किए जा रहे हैं। इस योजना में बांधों के पुनर्वास, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और निगरानी तंत्र को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है।हालांकि, इन तीन बांधों के नाम और प्रत्येक बांध में पाई गई विशिष्ट तकनीकी कमी को आधिकारिक रिपोर्ट से देखे बिना बताना उचित नहीं होगा। समाचार रिपोर्ट में यदि ये विवरण उपलब्ध हैं, तो इन्हें हूबहू रिपोर्ट के आधार पर शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि संरचनात्मक कमी की प्रकृति—जैसे सीपेज, क्रैक, स्लोप की समस्या, स्पिलवे की क्षमता, गेट की खराबी या नींव संबंधी समस्या—के आधार पर खतरे और सुधार की जरूरत अलग-अलग होती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Category-II में होना तत्काल बांध टूटने का प्रमाण नहीं है। इसका अर्थ है कि चिन्हित कमियों को गंभीरता से लेते हुए समयबद्ध सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था में भी Category-II को प्रमुख कमियों वाली श्रेणी माना गया है, जबकि सबसे गंभीर कमियों को Category-I में रखा जाता है।मानसून के दौरान लगातार बारिश और जलस्तर में उतार-चढ़ाव को देखते हुए इन बांधों की निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बांध में कमजोरी पाए जाने के बाद केवल मरम्मत ही नहीं, बल्कि नियमित इंस्ट्रूमेंटेशन, जलस्तर की निगरानी, आपातकालीन चेतावनी प्रणाली और डाउनस्ट्रीम आबादी के लिए स्पष्ट आपदा प्रबंधन योजना भी जरूरी है।अब सरकार के सामने चुनौती केवल रिपोर्ट पेश करने तक सीमित नहीं है, बल्कि चिन्हित कमियों को समयबद्ध तरीके से दूर करने और उनकी निगरानी सुनिश्चित करने की है। खासकर ऐसे समय में जब प्रदेश मानसून की चुनौतियों से जूझ रहा है, बांध सुरक्षा से जुड़े प्रत्येक तकनीकी निष्कर्ष को गंभीरता से लेना जरूरी है।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे तीन बांध कौन से हैं, उनमें वास्तव में किस प्रकार की संरचनात्मक कमियां मिली हैं और उन्हें दूर करने के लिए सरकार तथा संबंधित बांध प्रबंधन एजेंसियां क्या समयबद्ध कार्रवाई करने जा रही हैं।रचनात्मक कमियां, सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

