नूरपुर कांग्रेस में 43 साल की निष्ठा का दर्द! वरिष्ठ नेता सुदर्शन शर्मा के सवालों ने खोली नेतृत्व और प्रतिनिधित्व की बंद किताब, क्या अब बदलेगा राजनीतिक समीकरण….?

नूरपुर में कांग्रेस की अंदरूनी हलचल तेज! वर्षों से पार्टी के साथ खड़े सुदर्शन शर्मा की पीड़ा ने उठाया बड़ा सवाल—आखिर जमीनी नेताओं की राजनीतिक बारी कब आएगी….?
हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा की नूरपुर विधानसभा की राजनीति में कांग्रेस के वरिष्ठ, कर्मठ और सक्रिय नेताओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे ही वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुदर्शन शर्मा से राजनीतिक चर्चा के दौरान संगठन, निष्ठा और नेतृत्व के अवसरों को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए। बातचीत आगे बढ़ी तो वर्षों की राजनीतिक यात्रा, पार्टी के प्रति निष्ठा और नूरपुर का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा से जुड़े भाव भी चर्चा का हिस्सा बने।बातों-बातों में जब उनसे यह सवाल किया गया कि उन्होंने राजनीति में कदम कब और क्यों रखा तथा इतने लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद नूरपुर का प्रतिनिधित्व करने का अवसर क्यों नहीं मिला, तो बातचीत का माहौल अचानक गंभीर हो गया। उनके शब्दों में वर्षों की राजनीतिक तपस्या और अपेक्षाओं की झलक दिखाई दी। उन्होंने बताया कि 1983 में सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ अपनी निष्ठा बनाए रखी। अनुकूल परिस्थितियां रही हों या विपरीत, उन्होंने पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। लेकिन इतने लंबे सफर के बाद भी यदि राजनीतिक मंजिल वहीं दिखाई दे, जहां से यात्रा शुरू की थी, तो यह स्वाभाविक रूप से एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है।
नूरपुर की राजनीति को केवल एक विधानसभा क्षेत्र के चुनावी आंकड़ों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। नूरपुर, इंदौरा और ज्वाली क्षेत्र पंजाब की सीमा से सटे हुए हैं और पड़ोसी राज्य की सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों का प्रभाव भी यहां दिखाई देता है। इसके बावजूद नूरपुर का मतदाता स्थानीय विकास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को राजनीतिक निर्णयों में महत्व देता रहा है। यही कारण है कि यहां संगठन के साथ-साथ मजबूत स्थानीय नेतृत्व भी चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।नूरपुर कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि पार्टी के लंबे समय से जुड़े जमीनी नेताओं को भविष्य की राजनीति में किस तरह अवसर दिया जाए। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को केवल व्यक्तिगत टिकट की मांग के रूप में देखना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता। कई बार यह सवाल संगठन के भीतर सम्मान, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी से जुड़ जाता है। वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता यदि स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से दूर महसूस करें तो यह संगठन के लिए विचार का विषय बन सकता है।दूसरी ओर भाजपा ने भी नूरपुर और कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से डॉ. राजीव भारद्वाज को मैदान में उतारा और उन्होंने चुनाव जीता। इससे भाजपा को क्षेत्र में अपनी संगठनात्मक स्थिति मजबूत करने का राजनीतिक अवसर मिला।नगर परिषद नूरपुर की राजनीति भी समय के साथ बदलते समीकरणों की ओर संकेत करती है। अशोक कुमार शर्मा नगर परिषद अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं। हालांकि 2026 में नगर परिषद की राजनीति में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को भी सफलता मिली और नीति महाजन अध्यक्ष बनीं। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि नूरपुर में दोनों प्रमुख दल स्थानीय स्तर पर अपने-अपने संगठन और जनाधार को मजबूत करने में सक्रिय हैं।
ऐसे राजनीतिक वातावरण में कांग्रेस के लिए पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भूमिका आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकती है। सवाल केवल यह नहीं है कि किसे टिकट मिलेगा या कौन चुनाव लड़ेगा। बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्षों तक संगठन के लिए काम करने वाले स्थानीय चेहरों को पार्टी की भावी राजनीतिक रणनीति में पर्याप्त स्थान मिलेगा?नूरपुर की राजनीति अब उस मोड़ पर दिखाई देती है जहां पुराने राजनीतिक समीकरणों को नए सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण चुनौती दे रहे हैं। भाजपा अपने आधार को बढ़ाने में लगी है, जबकि कांग्रेस के सामने अपने परंपरागत समर्थन को बनाए रखने के साथ-साथ संगठन के भीतर नई ऊर्जा पैदा करने की चुनौती है।सुदर्शन शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक यात्रा इसी बहस को सामने लाती है। वर्षों की निष्ठा के बाद नेतृत्व का अवसर मिलने की अपेक्षा केवल एक व्यक्ति की भावना नहीं, बल्कि उन तमाम कार्यकर्ताओं की चर्चा का विषय बन सकती है जो लंबे समय से संगठन की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं।अब देखना यह होगा कि नूरपुर की राजनीति में आने वाले समय में निष्ठा, संगठनात्मक अनुभव और स्थानीय नेतृत्व को कितना महत्व मिलता है। क्योंकि चुनावी राजनीति में अंततः जनता ही तय करती है कि किस नेतृत्व पर भरोसा किया जाए, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह उतना ही महत्वपूर्ण है कि वे जनता तक पहुंचने वाले अपने जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को कितना राजनीतिक स्थान देते हैं।

