Writer KAPIL SHARMA
देश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। पत्रकार संगठन सक्रिय हैं, बैठकें हो रही हैं, ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं और मंचों से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग बुलंद हो रही है। पत्रकारों पर हमले निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय हैं। किसी पत्रकार को केवल इसलिए निशाना बनाया जाना कि उसने सत्ता, प्रशासन, व्यवस्था या किसी प्रभावशाली व्यक्ति से सवाल पूछ दिया—लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या पत्रकार सुरक्षा कानून मांगने से पहले पत्रकारों को उनके मौजूदा संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की पूरी जानकारी है–लोकतंत्र में पत्रकारिता को अक्सर “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। यह पत्रकारिता की लोकतांत्रिक भूमिका और महत्व का प्रतीक है, लेकिन संविधान में पत्रकारिता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह कोई अलग संवैधानिक “चौथा स्तंभ” दर्जा प्राप्त नहीं है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मूल आधार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है। साथ ही यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है और संविधान में निर्धारित युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लागू होते हैं।यहीं से असली सवाल शुरू होता है:जब पत्रकार संगठन सुरक्षा कानून की मांग करते हैं तो क्या वे पहले यह स्पष्ट करते हैं कि पत्रकार के मौलिक अधिकार क्या हैं? पत्रकार और मीडिया संस्थान के अधिकारों में क्या अंतर है? स्वतंत्र पत्रकार, स्ट्रिंगर, डिजिटल पत्रकार और कैमरा जर्नलिस्ट की कानूनी स्थिति क्या है? क्या केवल प्रेस कार्ड होना ही पत्रकार होने का प्रमाण है? और क्या बिना प्रेस कार्ड के काम करने वाला व्यक्ति पत्रकार नहीं माना जा सकता?
इन सवालों के जवाब के बिना सुरक्षा कानून की मांग कहीं-कहीं ऐसी दिखाई देती है जैसे नींव मजबूत किए बिना इमारत की छत पर नया मंजिल बनाने की तैयारी–पत्रकार सुरक्षा कानून का विरोध करने का कोई कारण नहीं है। यदि किसी पत्रकार पर उसके पेशेवर काम के कारण हमला होता है, उसे धमकी दी जाती है, उसके उपकरण छीने जाते हैं, रिपोर्टिंग से रोका जाता है या प्रतिशोध की भावना से उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है, तो उसके खिलाफ प्रभावी कानूनी संरक्षण होना चाहिए। लेकिन कानून की मांग केवल नारे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रस्तावित कानून किस समस्या का समाधान करेगा और उसकी सीमा क्या होगी।क्योंकि पत्रकारिता का संकट केवल हमलों तक सीमित नहीं है-आज बड़ी संख्या में पत्रकार रोजगार की असुरक्षा, कम वेतन, बिना नियुक्ति पत्र काम करने, समय पर भुगतान न मिलने, विज्ञापन के दबाव और संस्थागत असुरक्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई जगह पत्रकार से खबर लिखने के साथ-साथ विज्ञापन जुटाने की अपेक्षा की जाती है। दुर्घटना या किसी गंभीर संकट की स्थिति में उसके और उसके परिवार के लिए संस्थागत सुरक्षा कितनी है—यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।क्या पत्रकार सुरक्षा कानून इन सवालों को भी संबोधित करेगा-या फिर कानून बन जाएगा, प्रेस कार्ड जारी होंगे, मंचों पर बड़े-बड़े भाषण होंगे और जमीनी स्तर पर पत्रकार वही रहेगा—नौकरी बचाने की चिंता में दबा हुआ, आर्थिक दबाव में काम करता हुआ और प्रभावशाली लोगों से सवाल पूछने से पहले कई बार सोचने वाला..?पत्रकार संगठनों की भूमिका यहीं महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल यह कह देना कि “पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं”, पर्याप्त नहीं है। पत्रकारों को यह भी बताया जाना चाहिए कि संविधान उन्हें क्या अधिकार देता है और उन अधिकारों की सीमाएं क्या हैं। न्यायालयों ने अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े अनेक सिद्धांत विकसित किए हैं। इनका अध्ययन पत्रकार संगठनों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
संविधान भाषणों से नहीं चलता। संविधान पढ़ना पड़ता है, समझना पड़ता है और जरूरत पड़ने पर उसके संरक्षण के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ती है-लेकिन यहां पत्रकारिता की दूसरी तस्वीर भी सामने रखनी होगी। स्वतंत्रता का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है। पत्रकार को भी तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करना होगा। आरोप को प्रमाण की तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। खबर और प्रचार के बीच की रेखा समझनी होगी। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, निजता और कानूनी अधिकारों की अनदेखी करके पत्रकारिता की स्वतंत्रता का दावा नहीं किया जा सकता।अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है-इसलिए पत्रकार सुरक्षा का अर्थ केवल पुलिस सुरक्षा नहीं हो सकता। वास्तविक सुरक्षा का अर्थ है—बिना भय के रिपोर्टिंग करने का वातावरण, प्रतिशोध से संरक्षण, कानूनी सहायता, पेशेवर स्वतंत्रता, रोजगार की सुरक्षा, आर्थिक शोषण से बचाव और संकट की स्थिति में पत्रकार तथा उसके परिवार के लिए आवश्यक सामाजिक सुरक्षा।अब सवाल पत्रकार संगठनों से भी होना चाहिए।-वे पत्रकारों के वेतन और रोजगार के मुद्दे पर कितनी बार मजबूती से खड़े हुए? कितनी बार विज्ञापन और पत्रकारिता के बीच बढ़ते दबाव पर सवाल उठाया? कितनी बार पत्रकारों पर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव का विरोध किया? कितनी बार पत्रकारों को कानूनी अधिकारों की जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण आयोजित किए? और कितनी बार उन्होंने पत्रकारिता के नाम पर सक्रिय फर्जी लोगों के विरुद्ध आवाज उठाई?
संगठन केवल बैनर, पदाधिकारी और बैठक का नाम नहीं है। संगठन की असली पहचान संकट के समय उसके संघर्ष से होती है-पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग होनी चाहिए तो वह गंभीर अध्ययन, व्यापक सहमति और स्पष्ट कानूनी ढांचे के साथ होनी चाहिए। उसमें पत्रकार की सुरक्षा के साथ उसकी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी—तीनों का संतुलन होना चाहिए।क्योंकि केवल कानून बना देने से पत्रकार सुरक्षित नहीं हो जाएगा। यदि संस्थागत दबाव, आर्थिक असुरक्षा और राजनीतिक प्रभाव कायम रहे तो कानून कागज पर मजबूत और जमीन पर कमजोर साबित हो सकता है।इसलिए सवाल पत्रकार सुरक्षा कानून के खिलाफ नहीं है। सवाल प्राथमिकता और तैयारी का है।पहले पत्रकार को उसके अधिकार बताइए।फिर उसके अधिकारों की रक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्था खड़ी कीजिए।फिर पत्रकारिता की स्वतंत्रता को मजबूत कीजिए।और उसके बाद सुरक्षा कानून को प्रभावी कानूनी हथियार बनाइए।क्योंकि पत्रकारिता केवल “चौथा स्तंभ” लिख देने से मजबूत नहीं होती। उसे मजबूत बनाता है—संविधान की समझ, तथ्य की ताकत, कानून का ज्ञान और सत्ता से सवाल पूछने का साहस।कल इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितने मंचों पर पत्रकार सुरक्षा कानून का नारा लगाया गया था। इतिहास यह पूछेगा कि जब पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर दबाव पड़ा, तब कितने लोग वास्तव में पत्रकार के साथ खड़े हुए थे।पत्रकार को केवल सुरक्षा नहीं चाहिए—उसे स्वतंत्रता चाहिए।और स्वतंत्रता केवल कानून मांगने से नहीं मिलती।उसे समझना पड़ता है, उसकी सीमाओं को जानना पड़ता है, उसकी रक्षा करनी पड़ती है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए लड़ना पड़ता है।

