हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल और नई नियुक्तियों की सुगबुगाहट के बीच दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है—सत्ता में होना और संगठन का मजबूत होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। सरकार अपनी नीतियों और योजनाओं के सहारे शासन चला सकती है, लेकिन चुनावी राजनीति में सफलता के लिए मजबूत, सक्रिय और जमीनी संगठन अनिवार्य है। कांग्रेस हाईकमान का प्रदेश से लेकर बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर जोर इसी राजनीतिक आवश्यकता की ओर संकेत करता है।
नई दिल्ली में राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की अध्यक्षता में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल, सह प्रभारी विदित चौधरी और चेतन चौहान तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार के साथ हुई बैठक को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। बैठक में प्रदेश, जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर पर संगठनात्मक कमेटियों की स्थिति की समीक्षा और लंबित नियुक्तियों को जल्द पूरा करने पर चर्चा इस बात का संकेत है कि कांग्रेस अब संगठन को चुनावी मशीनरी के रूप में सक्रिय करने की दिशा में बढ़ना चाहती है।
सवाल यह है कि कांग्रेस को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? इसका सीधा उत्तर है—सिर्फ सरकार के काम से चुनाव नहीं जीते जाते, संगठन उन कामों को जनता तक पहुंचाता है। यदि बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं है, मंडल और ब्लॉक स्तर पर संवाद कमजोर है तथा जिला संगठन जनता के बीच लगातार मौजूद नहीं है तो सरकार की उपलब्धियां कागजों तक सीमित रह सकती हैं।
कांग्रेस के सामने दूसरी चुनौती विपक्ष की आक्रामक राजनीति है। भाजपा स्वाभाविक रूप से सरकार की कमियों को मुद्दा बनाएगी। ऐसे में कांग्रेस को केवल बचाव की राजनीति से आगे बढ़कर तथ्यों के साथ जवाब देने और अपनी उपलब्धियों को प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचाने की आवश्यकता है। यही कारण है कि हाईकमान ने भाजपा के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के साथ सरकार की नीतियों और उपलब्धियों को जमीनी स्तर तक ले जाने पर जोर दिया है।
लेकिन संगठन मजबूत करने का अर्थ केवल पद बांटना नहीं होना चाहिए। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई नियुक्तियां केवल राजनीतिक संतुलन का माध्यम न बनें, बल्कि उनमें ऐसे लोगों को स्थान मिले जो कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्य हों, जनता से जुड़े हों और संगठन को समय दे सकें। वरिष्ठ नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने की चर्चा अपने आप में सकारात्मक है, लेकिन वरिष्ठता के साथ सक्रियता और जनाधार का संतुलन भी जरूरी होगा।
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में बूथ स्तर का संगठन विशेष महत्व रखता है। दूरदराज के गांवों में पार्टी की मौजूदगी, स्थानीय समस्याओं की जानकारी और कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद ही चुनावी राजनीति की वास्तविक ताकत बनते हैं। सोशल मीडिया की राजनीति महत्वपूर्ण है, लेकिन हिमाचल की सियासत अभी भी काफी हद तक व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय समीकरण और कार्यकर्ता नेटवर्क पर निर्भर करती है।
मंत्रिमंडल विस्तार और विधानसभा उपाध्यक्ष जैसे विषयों पर अलग राजनीतिक चर्चाएं भले ही चल रही हों, लेकिन संगठन का सवाल उससे कहीं व्यापक है। सत्ता में रहते हुए संगठन को मजबूत करना कांग्रेस के लिए समय की मांग है। यदि पार्टी अभी से बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करती है, उनकी शिकायतें सुनती है और जिम्मेदारियां स्पष्ट करती है, तो आने वाले चुनावी मुकाबले में उसे इसका लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस नेतृत्व को यह भी समझना होगा कि संगठन केवल चुनाव के समय याद आने वाली व्यवस्था नहीं है। मजबूत संगठन वह है जो चुनाव के बीच भी जनता के बीच मौजूद रहे। बेरोजगारी, महंगाई, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर पार्टी कार्यकर्ता जनता की आवाज बनें, तभी संगठन की वास्तविक उपयोगिता साबित होगी।
दिल्ली की बैठक से निकला सबसे बड़ा संदेश यही है कि कांग्रेस अब संगठनात्मक कमजोरी को दूर करने की कोशिश में गंभीर दिखाई दे रही है। नई नियुक्तियां यदि योग्यता, सक्रियता, क्षेत्रीय संतुलन और कार्यकर्ताओं की स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर होती हैं तो यह कांग्रेस के लिए नई ऊर्जा का कारण बन सकती हैं।
आखिर राजनीति में चेहरों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह नेटवर्क होता है जो उन चेहरों को जनता तक पहुंचाता है। कांग्रेस के लिए सरकार चलाना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन मजबूत संगठन बनाना भविष्य की राजनीतिक चुनौती है। इस चुनौती का जवाब जितनी गंभीरता और ईमानदारी से दिया जाएगा, उतना ही पार्टी का राजनीतिक आधार मजबूत होगा।

