Reading: संपादकीय: माता-पिता के आपसी झगड़े और पारिवारिक कलह की वजह से अपने ही बच्चों को मौत के घाट उतार देना निंदनीय, अमानवीय और घोर वहशीपन है।

संपादकीय: माता-पिता के आपसी झगड़े और पारिवारिक कलह की वजह से अपने ही बच्चों को मौत के घाट उतार देना निंदनीय, अमानवीय और घोर वहशीपन है।

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन, मंथन और विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य यह है कि पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़े का अंत अब बच्चों की मौत के साथ होगा…? इस धारणा की बढ़ती प्रवृत्ति पर चर्चा करना अनिवार्य है आज इस लेख में मैंने इसके महात्व पूर्ण विषयों को छूने की कोशिश की है —+ संपादक राम प्रकाश वत्स

माता-पिता के आपसी झगड़े और पारिवारिक कलह की वजह से अपने ही बच्चों को मौत के घाट उतार देना निंदनीय, अमानवीय और घोर वहशीपन है। बच्चे माता-पिता के संघर्ष के दोषी नहीं होते, फिर उन्हें ऐसी भयावह सजा क्यों दी जाए? पति-पत्नी के विवाद, क्रोध, तनाव या प्रतिशोध का खामियाजा मासूम बच्चों की जिंदगी छीनकर भुगतना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं हो सकता। ऐसे मामलों को केवल अपराध मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक कारणों पर भी गंभीरता से विचार जरूरी है। परिवार में बढ़ते तनाव के बीच बच्चों की सुरक्षा समाज और व्यवस्था की सर्वोच्च जिम्मेदारी होनी चाहिए।

यह सवाल केवल चंबा में रावी नदी में मासूम बच्चे को फेंके जाने की भयावह घटना तक सीमित नहीं है। जब भी परिवार के भीतर कलह, गुस्सा, बदला और मानसिक तनाव की कोई दर्दनाक घटना सामने आती है, सबसे बड़ा सवाल यही होता है—माता-पिता के विवाद की सजा आखिर बच्चों को क्यों भुगतनी पड़ती है?पति-पत्नी का विवाद कोई नई बात नहीं है। विचारों में मतभेद, आर्थिक परेशानी, पारिवारिक दबाव, आपसी अविश्वास और घरेलू तनाव के कारण दंपती के बीच तकरार हो सकती है। लेकिन जब यही तकरार गुस्से, हिंसा और प्रतिशोध में बदल जाती है, तो सबसे अधिक असुरक्षित वे बच्चे हो जाते हैं, जिनका उस विवाद से कोई लेना-देना ही नहीं होता।सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब कोई माता या पिता अपने जीवनसाथी से बदला लेने के लिए बच्चे को ही माध्यम बना लेता है। बच्चा न तो पति-पत्नी के झगड़े का कारण होता है और न ही वह उस विवाद को समझने की उम्र में होता है।

फिर उसके जीवन को समाप्त करने का अधिकार किसी को कैसे मिल सकता है?बच्चे क्यों बनते हैं माता-पिता के गुस्से का शिकार?माता-पिता का गुस्सा जब विवेक पर हावी हो जाता है तो कुछ लोग उस क्षण यह भूल जाते हैं कि सामने उनका अपना बच्चा है। पति-पत्नी के बीच पैदा हुआ क्रोध धीरे-धीरे प्रतिशोध में बदलता है और कई बार बच्चा उसी प्रतिशोध का सबसे आसान निशाना बना दिया जाता है।यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह हमारे सामाजिक ढांचे के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि घर में रोज झगड़ा होता है, बच्चे के सामने गाली-गलौज होती है, मारपीट होती है या एक-दूसरे को धमकाया जाता है, तो बच्चा भले ही शारीरिक रूप से सुरक्षित रहे, लेकिन उसके मन पर गहरी चोट पड़ती है।

क्या गृह क्लेश का समाधान मृत्यु है?बिल्कुल नहीं।

किसी भी वैवाहिक विवाद का समाधान बातचीत, परिवार के बुजुर्गों की मध्यस्थता, कानूनी सहायता या आवश्यकता पड़ने पर अलगाव हो सकता है। लेकिन बच्चे की जिंदगी छीन लेना किसी भी परिस्थिति में समाधान नहीं हो सकता।पति-पत्नी का रिश्ता टूट सकता है, लेकिन माता-पिता का दायित्व समाप्त नहीं होता। तलाक हो जाए, अलगाव हो जाए या परिवार में गंभीर विवाद हो

बच्चे का अधिकार फिर भी सुरक्षित बचपन, शिक्षा, प्यार और जीवन पर है।गुस्से के एक क्षण में जिंदगी भर का अपराध

आज समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि गुस्सा कुछ मिनट का हो सकता है, लेकिन उसके परिणाम पूरी जिंदगी भुगतने पड़ सकते हैं। एक क्षण का आवेश किसी मासूम की जिंदगी छीन सकता है और पीछे रह जाते हैं माता-पिता, परिवार और समाज के लिए ऐसे सवाल जिनका कोई आसान जवाब नहीं होता।

ऐसी घटनाओं में केवल अपराधी को सजा देना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि वह स्थिति बनी कैसे? परिवार में लंबे समय से विवाद था तो आसपास के लोगों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? यदि दंपती के बीच लगातार तनाव था तो परिवार, रिश्तेदार, पंचायत या सामाजिक संस्थाएं समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं कर सकीं?

समाज को तमाशबीन नहीं, संवेदनशील बनना होगाहम अक्सर कहते हैं कि “यह उनका पारिवारिक मामला है।” यही सोच कई बार बड़ी त्रासदी का कारण बन जाती है। यदि किसी परिवार में लगातार हिंसा, धमकी या गंभीर झगड़े की स्थिति दिखाई दे रही है तो उसे केवल निजी मामला मानकर चुप रहना उचित नहीं है।परिवार के सदस्य, पड़ोसी, शिक्षक और समाज के जिम्मेदार लोग समय रहते हस्तक्षेप करें। जरूरत पड़े तो संबंधित प्रशासन और कानून-व्यवस्था की मदद ली जाए। किसी व्यक्ति में अत्यधिक गुस्सा, आत्मघाती सोच या बच्चे को नुकसान पहुंचाने की धमकी दिखाई दे तो इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।बच्चे किसी विवाद की संपत्ति नहीं हैं

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे माता या पिता की संपत्ति नहीं हैं। वे स्वतंत्र जीवन और भविष्य वाले इंसान हैं। उन्हें पति-पत्नी के रिश्ते की लड़ाई में हथियार बनाना केवल नैतिक रूप से गलत नहीं, बल्कि गंभीर अपराध भी है।माता-पिता को यह समझना होगा कि उनका बच्चा उनके गुस्से का माध्यम नहीं, उनके भविष्य की जिम्मेदारी है। बच्चे को दूसरे अभिभावक से बदला लेने का साधन बनाना उसके अधिकारों और उसके जीवन दोनों के साथ अन्याय है।

अब चिंतन का समय है चंबा जैसी घटनाएं समाज को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। हमें यह सवाल केवल घटना के बाद नहीं पूछना चाहिए कि अपराध किसने किया। हमें यह भी पूछना चाहिए कि ऐसी स्थिति बनने से पहले परिवार और समाज ने क्या किया?

क्या हम अपने आसपास उन परिवारों को पहचान पा रहे हैं जहां रोजाना झगड़े होते हैं?

क्या हम ऐसे बच्चों की मानसिक पीड़ा समझ रहे हैं जो हर दिन माता-पिता के विवाद के बीच बड़े हो रहे हैं? क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था में परिवारों को समय रहते परामर्श और सहायता मिल रही है?

इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है।

माता-पिता के झगड़े की कीमत बच्चों जिंदगी लैकर नहीं चुकानी चाहिए।

पति-पत्नी का विवाद किसी भी स्तर तक पहुंचे, लेकिन बच्चे की जिंदगी उस विवाद से ऊपर है।गुस्सा आए तो दूरी बनाई जा सकती है, बातचीत रोकी जा सकती है,

परिवार या कानून की मदद ली जा सकती है—लेकिन मासूम की जिंदगी से खिलवाड़ का कोई अधिकार किसी माता-पिता को नहीं है।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक बच्चे का नहीं है—सवाल उन तमाम मासूम जिंदगियों का है, जो अपने माता-पिता के गुस्से और विवाद के बीच चुपचाप अपना बचपन खो रही हैं।अभिभावकों द्वारा बच्चों की हत्या या उन्हें किसी भी तरह मौत के मुंह में धकेल देना बेहद गंभीर और बहुआयामी सामाजिक त्रासदी है।

इसके पीछे एक ही कारण नहीं होता, बल्कि कई परिस्थितियां एक साथ काम कर सकती हैं।

मुख्य संभावित कारण हैं:

पति-पत्नी का लगातार घरेलू कलह — माता-पिता का आपसी विवाद कई बार इतना बढ़ जाता है कि बच्चे संघर्ष के बीच सबसे कमजोर कड़ी बन जाते हैं।

अत्यधिक क्रोध और आवेग -क्षणिक गुस्से में व्यक्ति परिणामों पर विचार किए बिना हिंसक कदम उठा सकता है।

च्चों को विवाद का माध्यम बनाना -पति-पत्नी के रिश्ते में टूटन या बदले की भावना होने पर कभी-कभी बच्चे को दूसरे अभिभावक को चोट पहुंचाने के माध्यम के रूप में देखा जाता है।

आर्थिक और सामाजिक दबाव — गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी, पारिवारिक तनाव और भविष्य की चिंता व्यक्ति की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।नशे की समस्या

शराब या अन्य नशीले पदार्थों के प्रभाव में नियंत्रण, विवेक और भावनात्मक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।मानसिक संकट और गंभीर भावनात्मक अस्थिरता

कुछ मामलों में व्यक्ति अत्यधिक निराशा, भय, भ्रम या अन्य मानसिक संकट से गुजर रहा होता है। हालांकि हर मानसिक स्वास्थ्य समस्या हिंसा का कारण नहीं होती।पारिवारिक एवं सामाजिक सहयोग का अभाव

जब दंपति के विवाद समय रहते परिवार, समुदाय या पेशेवर सहायता तक नहीं पहुंचते, तो संकट गहरा सकता है

बच्चों को स्वतंत्र व्यक्ति न मानना — कुछ अभिभावक बच्चों को अपनी संपत्ति या अपने वैवाहिक संघर्ष का हिस्सा समझने लगते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और अधिकारों की उपेक्षा होती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि माता-पिता का झगड़ा बच्चों की गलती नहीं है और बच्चे को उसकी कीमत अपनी जान देकर कभी नहीं चुकानी चाहिए। ऐसे मामलों को केवल अपराध के रूप में देखने के साथ-साथ घरेलू हिंसा, नशा, आर्थिक तनाव, पारिवारिक परामर्श और मानसिक संकट की शुरुआती पहचान पर भी गंभीरता से काम करना आवश्यक है।

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