संपादक न्यूज इंडिया आजतक राम प्रकाश वत्स

प्राकृतिक झीलों का बढ़ता आकार और ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भविष्य के बड़े जलप्रलय का संकेत दे रहा है। भारत भी इस खतरे से अछूता नहीं है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो ग्लेशियल झील के फटने यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) से जनहानि के साथ सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं, गांवों और कृषि भूमि को भारी नुकसान हो सकता है।हिमालय को भारत की जल-सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है, लेकिन बदलते जलवायु परिदृश्य ने इसी हिमालय को नए खतरे के क्षेत्र में खड़ा कर दिया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के 1984 से 2023 तक के उपग्रह विश्लेषण के अनुसार भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 2016-17 के दौरान 10 हेक्टेयर से अधिक आकार की 2,431 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई थीं। इनमें से 676 झीलों का 1984 के बाद उल्लेखनीय विस्तार हुआ। इनमें 130 झीलें भारत की सीमा में हैं—65 सिंधु, 7 गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में।हिमाचल प्रदेश के लिए भी आंकड़े विशेष चिंता पैदा करते हैं। 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गेपन घाट ग्लेशियल झील का क्षेत्रफल 1989 में लगभग 36.49 हेक्टेयर था, जो 2022 तक बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया। यानी करीब 178 प्रतिशत की वृद्धि, जबकि औसत वृद्धि लगभग 1.96 हेक्टेयर प्रतिवर्ष रही। वैज्ञानिक अध्ययनों में इस झील को भविष्य में GLOF के संभावित खतरे वाली झीलों में शामिल किया गया है।यह खतरा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। अक्टूबर 2023 में सिक्किम की तीस्ता घाटी में ग्लेशियल झील फटने की घटना ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को सामने ला दिया था। फरवरी 2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ में भी 200 से अधिक लोगों की मौत हुई और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा।
अब चेतावनी को कार्रवाई में बदलने की जरूरत-ग्लेशियल झीलों का विस्तार केवल बढ़ते तापमान का परिणाम नहीं है। बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और झील को रोकने वाले प्राकृतिक बांध के कमजोर होने से अचानक पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है। यही GLOF कुछ ही समय में नदी घाटियों में विनाशकारी बाढ़ का रूप ले सकता है।ऐसे में भारत को समय से पहले, पूरी ताकत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ तैयारी करनी होगी। संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की 24 घंटे निगरानी, सैटेलाइट और ड्रोन सर्विलांस, स्वचालित जलस्तर सेंसर, डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में सायरन आधारित चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निकासी मार्ग और गांव स्तर पर आपदा प्रशिक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।
जिनके फटने पर कुछ ही मिनटों या घंटों में आबादी वाले क्षेत्रों तक बाढ़ पहुंच सकती है। साथ ही बांधों, जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों और पुलों की योजना बनाते समय GLOF जोखिम को अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।पड़ोसी क्षेत्र की घटनाओं से भी सबकअगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान के बड़े ढहाव के बाद अचानक बाढ़ और उसके बाद बनी झील ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में इस खतरे को फिर सामने ला दिया है। रिपोर्टों के अनुसार नई बनी झील में लाखों घन मीटर पानी जमा होने की आशंका के कारण आगे भी बाढ़ का खतरा बना रहा।इस घटना से भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि हिमालय किसी एक देश की सीमा तक सीमित प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है। नेपाल, भारत और तिब्बत/चीन क्षेत्र में होने वाले ग्लेशियर परिवर्तन और नदी-प्रवाह का असर सीमापार क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। इसलिए भारत को पड़ोसी देशों के साथ वास्तविक समय में जलस्तर, ग्लेशियर और आपदा संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए।आज आवश्यकता किसी घटना के बाद राहत पहुंचाने की नहीं, बल्कि घटना से पहले खतरे को पहचानकर जनहानि और मालहानि रोकने की है। हिमालय में बढ़ती ग्लेशियल झीलें प्रकृति की एक स्पष्ट चेतावनी हैं—अगर आंकड़ों को नजरअंदाज किया गया तो आने वाली आपदाएं कहीं अधिक महंगी साबित हो सकती हैं।

