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अन्याय का जवाब बंदूक नहीं… विकास और संवाद ही रास्ता” — नक्सलवाद पर लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह का बड़ा बयान, 31 मार्च की डेडलाइन से पहले संसद में गरमाई बहस

RamParkash Vats
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  1. किसी के साथ अन्याय हो सकता है, लेकिन अन्याय के जवाब में हथियार उठाना सही रास्ता नहीं है।”
  2. “जो हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहता है, सरकार उससे बातचीत के लिए तैयार है।”
  3. “जो गोली चलाएगा, उसका जवाब गोली से दिया जाएगा — यह हमारी स्पष्ट नीति है।”
  4. “रेड कॉरिडोर का दायरा लगातार सिमटा है और विकास अब गांव-गांव तक पहुंच रहा है।”
  5. “बस्तर में नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है, हर गांव में स्कूल और राशन की सुविधा दी जा रही है।”
  6. “नक्सलवाद की जड़ गरीबी नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जिसने विकास को रोका।”
  7. “2014 के बाद आदिवासी इलाकों में सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं तेजी से पहुंची हैं।”
  8. “लोकतंत्र में बंदूक नहीं, संवाद और संविधान ही समाधान का रास्ता है।”
  9. “हजारों जवानों ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बलिदान दिया, देश उनका ऋणी रहेगा।”
  10. “31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं।”
NEWS INDIA AAJ TAK EDITOR RAM PARKASH VATS

देश में नक्सलवाद के खात्मे की तय समय सीमा 31 मार्च 2026 से ठीक पहले संसद में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा देखने को मिली। लोकसभा में नियम 193 के तहत हुई इस बहस में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार की रणनीति, सुरक्षा बलों की भूमिका और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हुए विकास कार्यों का विस्तृत खाका पेश किया। सूत्रों के अनुसार गृह मंत्री ने स्पष्ट कहा कि “किसी के साथ अन्याय हो सकता है, लेकिन अन्याय के जवाब में हथियार उठाना सही रास्ता नहीं है।”

सूत्रों के मुताबिक, अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी है। उन्होंने दावा किया कि जो इलाका कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता था, वहां अब विकास की योजनाएं पहुंच रही हैं और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार की नीति स्पष्ट है—जो हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटना चाहता है, उसके लिए बातचीत के दरवाजे खुले हैं, लेकिन जो गोली चलाएगा, उसे जवाब भी गोली से दिया जाएगा।

“अन्याय हो सकता है, लेकिन बंदूक रास्ता नहीं” — शाह

सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्री ने अपने भाषण में कहा कि किसी भी समाज में अन्याय की घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में समाधान के कई रास्ते होते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हथियार उठाना ही एकमात्र विकल्प है? उन्होंने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संवाद, विकास और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से समस्याओं का समाधान संभव है।

गृह मंत्री ने कहा कि दशकों तक आदिवासी इलाकों में विकास नहीं पहुंच पाया, जिसका फायदा नक्सली संगठनों ने उठाया। उन्होंने दावा किया कि अब सरकार गांव-गांव तक सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और राशन की सुविधाएं पहुंचा रही है। शाह ने विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है और गांव-गांव में सरकारी योजनाएं लागू हुई हैं।

रेड कॉरिडोर से विकास की ओर बढ़ने का दावा

सूत्रों के अनुसार अमित शाह ने कहा कि पहले 12 राज्यों के 200 से अधिक जिलों में नक्सलवाद का प्रभाव था। लेकिन अब सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण यह दायरा काफी सीमित हो गया है। उन्होंने कहा कि बस्तर में स्कूल खोले गए, राशन दुकानें स्थापित हुईं और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचीं।

गृह मंत्री ने कहा कि 2014 के बाद केंद्र सरकार ने गरीबों को आवास, गैस कनेक्शन, मुफ्त राशन, स्वास्थ्य बीमा और पीने का पानी उपलब्ध कराया। उन्होंने सवाल उठाया कि दशकों तक इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं पहुंचीं। सूत्रों के अनुसार शाह ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासी इलाकों के विकास की अनदेखी के कारण नक्सलवाद को बढ़ावा मिला।

“नक्सलवाद की जड़ विचारधारा, गरीबी नहीं”

सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलवाद को केवल गरीबी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि यह एक वैचारिक आंदोलन है जिसने विकास को रोकने का काम किया। शाह ने कहा कि जब सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनने शुरू हुए, तो नक्सली संगठनों ने इसका विरोध किया।

उन्होंने कहा कि नक्सल हिंसा में हजारों जवान और नागरिक मारे गए। गृह मंत्री ने सुरक्षा बलों के बलिदान को याद करते हुए कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए कई जवानों ने अपना जीवन न्योछावर किया है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य केवल सुरक्षा अभियान नहीं बल्कि स्थायी शांति स्थापित करना है।

संसद में विपक्ष के सवाल भी तेज

सूत्रों के अनुसार नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने भी कई सवाल उठाए। कुछ सांसदों ने कहा कि आदिवासी इलाकों में विस्थापन, संसाधनों पर अधिकार और विकास परियोजनाओं को लेकर असंतोष बढ़ा है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद को केवल सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक समस्या के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

एक सांसद ने कहा कि “जन्म से कोई नक्सली नहीं होता, परिस्थितियां उसे उस दिशा में धकेलती हैं।” वहीं अन्य सदस्यों ने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन से हटाया गया, जिससे असंतोष पैदा हुआ।

सूत्रों के मुताबिक कुछ सांसदों ने यह भी सवाल उठाया कि नक्सलवाद के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी नक्सलवाद से लड़ाई।

सत्तापक्ष का पलटवार

सत्तापक्ष के कई सांसदों ने सरकार की नीति का समर्थन किया। सूत्रों के अनुसार उन्होंने कहा कि नक्सलवाद ने देश को दशकों तक नुकसान पहुंचाया और हजारों लोगों की जान ली। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने सुरक्षा और विकास दोनों मोर्चों पर काम किया है।

कुछ सांसदों ने कहा कि 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन चार दशकों में कई राज्यों तक फैल गया। उनका आरोप था कि पूर्व की सरकारों ने समय रहते कदम नहीं उठाए। उन्होंने कहा कि अब सरकार ने सख्त नीति अपनाकर नक्सलवाद को खत्म करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए हैं।

आत्मसमर्पण और मुख्यधारा में लौटने की नीति

सूत्रों के अनुसार गृह मंत्री ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता नक्सलियों को मुख्यधारा में लाना है। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और उन्हें पुनर्वास योजनाओं का लाभ दिया गया है। शाह ने कहा कि सरकार चाहती है कि युवाओं के हाथ में बंदूक नहीं बल्कि किताब हो।

उन्होंने कहा कि जो लोग वर्षों तक जंगलों में रहे, वे अब सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। इसके लिए सरकार रोजगार, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता दे रही है।

1970 से 2026 तक की बहस का जिक्र

सूत्रों के मुताबिक अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद पर संसद में हो रही चर्चा ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें 1970 से 2026 तक की घटनाओं की समीक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि देश की आंतरिक स्थिरता और विकास से जुड़ा विषय है।

गृह मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार नक्सलवाद को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है और तय समय सीमा के भीतर निर्णायक परिणाम सामने आएंगे।

31 मार्च की डेडलाइन पर नजर

सूत्रों के अनुसार सरकार ने पहले घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी डेडलाइन से पहले संसद में हुई चर्चा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास योजनाओं के कारण हालात में तेजी से सुधार हुआ है।

उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में पहले प्रशासन नहीं पहुंच पाता था, वहां अब सरकारी योजनाएं लागू हो रही हैं। सड़क, मोबाइल टावर, बैंकिंग सुविधाएं और शिक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है।

शहीद जवानों को श्रद्धांजलि

गृह मंत्री ने अपने भाषण में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में कई सुरक्षाकर्मियों ने बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि देश उनके त्याग को हमेशा याद रखेगा।

निष्कर्ष: संवाद, विकास और सख्ती की त्रिस्तरीय रणनीति

सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि सरकार की रणनीति तीन स्तरों पर केंद्रित है—सुरक्षा कार्रवाई, विकास योजनाएं और आत्मसमर्पण नीति। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई जारी रखेगी, लेकिन साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी जाएगी।

लोकसभा में हुई इस विस्तृत चर्चा ने साफ कर दिया कि नक्सलवाद केवल सुरक्षा मुद्दा नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बहस का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार नक्सलवाद के अंत का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष इसके कारणों और आदिवासी अधिकारों पर जोर दे रहा है।

31 मार्च की तय समय सीमा से पहले हुई यह बहस आने वाले दिनों में सरकार की नीति और जमीनी स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देती है। अब नजर इस बात पर है कि घोषित लक्ष्य के अनुरूप नक्सलवाद पर कितना नियंत्रण संभव हो पाता है और क्या विकास के जरिए स्थायी शांति स्थापित हो सकेगी।

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