Reading: सिद्ध बाबा शिब्बो थान महिमा अमृत कथा- लेखक बाबा शिब्बो थान बंशज महन्त राम प्रकाश बत्स ज्योतिषी

सिद्ध बाबा शिब्बो थान महिमा अमृत कथा- लेखक बाबा शिब्बो थान बंशज महन्त राम प्रकाश बत्स ज्योतिषी

RamParkash Vats
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सूचना:-यह पुस्तक अभी बाबा शिब्बो थान महिमा अमृत कथा लिखी जा रही है जल्दी ही प्रकाशित होगी

****सिद्ध बाबा शिब्बो थान महिमा अमृत कथा*****

बाबा शिब्बो थान मन्दिर में स्थित सनातन काल से स्थापित शिवलिंग जिसके ज्ञान बैठकर बाबा शिब्बो ने तप किया था

जब-जब इस धरती पर भक्ति की अग्नि प्रज्वलित होती है, तब-तब साधकों की तपस्या से वन भी तीर्थ बन जाते हैं। आज मैं आपको उसी दिव्य कथा का श्रवण करा रहा हूँ—सिद्ध महापुरुष बाबा शिब्बो की कथा, जो त्याग, तप और तत्त्वज्ञान का अमर उदाहरण है।
भाइयों और बहनों, वह आधी रात का समय था। समस्त संसार निद्रा में लीन था, परंतु एक साधक की आत्मा जाग उठी थी। बाबा शिब्बो ने गृहस्थ जीवन का मौन त्याग किया। न कोई आडंबर, न कोई घोषणा—बस अंतर्मन में जागी परम पुकार। पूर्व जन्म की स्मृतियाँ उनके चित्त में तरंगित हो रही थीं। उन्हें स्मरण था कि यह जन्म केवल भोग के लिए नहीं, योग के लिए है; केवल संसार के लिए नहीं, शिव के लिए है।
वे भरमाड़ के घने जंगलों की ओर प्रस्थान कर गए। चारों ओर अंधकार था, किंतु साधक के भीतर प्रकाश जाग चुका था। कहते हैं, जब आत्मा पुकारती है तो स्वयं ईश्वर मार्ग दिखाते हैं। उसी रात्रि बाबा ने देखा—एक प्राचीन शिवलिंग से दिव्य ज्योति प्रकट हो रही है। वह कोई साधारण प्रकाश नहीं था; वह चेतना का तेज था, स्वयं महादेव की कृपा का संकेत।
उस ज्योति के सम्मुख बाबा शिब्बो ने आसन स्थापित किया। भूमि को ही अपना आसन बनाया, आकाश को ही अपना छत्र। उन्होंने नेत्र मूँदे और प्राणों को मंत्र में स्थिर कर दिया—“जाहरवीराय नमः।” यह केवल जप नहीं था, यह आत्मा की आह्वान-ध्वनि थी। प्रत्येक श्वास में नाम, प्रत्येक निश्वास में समर्पण।
भक्तजनो, तपस्या खेल नहीं है। तपस्या वह अग्नि है जिसमें अहंकार जलता है और आत्मा शुद्ध होती है। बाबा शिब्बो बारह वर्षों तक अचल बैठे रहे। ऋतुएँ बदलती रहीं—गर्मी की तपन, वर्षा की धार, शीत की कंपकंपी—परंतु साधक अडिग रहे। उनके शरीर पर वामी (चींटियों) ने अपना घर बना लिया। मिट्टी ने उन्हें ढक लिया, घास और झाड़ियाँ उनके ऊपर उग आईं। मानो प्रकृति स्वयं उन्हें समाधिस्थ शिवरूप मानकर आवरण दे रही हो।
यह दृश्य केवल बाहरी नहीं था; यह संकेत था कि जब साधक देहभाव से ऊपर उठ जाता है, तब प्रकृति भी उसे साधारण मनुष्य नहीं, दिव्य चेतना के रूप में स्वीकार करती है। बाबा का शरीर मिट्टी में ढका था, पर आत्मा आकाश में विचर रही थी। वे देह से परे, नाम में लीन, शिव में स्थित हो चुके थे।
बारह वर्षों की उस अविरल तपस्या का प्रभाव धीरे-धीरे समस्त क्षेत्र में फैलने लगा। जंगल का वह निर्जन स्थान भक्ति का केंद्र बन गया। जहाँ पहले भय था, वहाँ अब शांति थी। जहाँ पहले अंधकार था, वहाँ अब प्रकाश का अनुभव होने लगा। चरवाहे, वनवासी, साधक—सब उस स्थान की ओर आकर्षित होने लगे। उन्हें अनुभव होता कि वहाँ कोई अदृश्य शक्ति विराजमान है।

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