Reading: फरोग गांव में गूंज रही श्रीमद्भागवत कथा, पितृ शांति हेतु भव्य आयोजन — 30 अप्रैल को होगा समापन

फरोग गांव में गूंज रही श्रीमद्भागवत कथा, पितृ शांति हेतु भव्य आयोजन — 30 अप्रैल को होगा समापन

RamParkash Vats
6 Min Read

सिरमौर जनपद के पवित्र पर्वतीय अंचल में स्थित पीडिया धार क्षेत्र का ग्राम फरोग (टिक्करी) इन दिनों भक्ति मय रंग के साथ प्राकृति के आंचल में भक्ति में सिरमौर लोग और आस्थाओं का सैलाव, भजन कीर्तन की गुंजित स्वर और लहरिया की पवन अविरल वायु के वेग ने इस क्षेत्र को भक्ति मय और देवताओं का संगम स्थल में परिवर्तित कर दिया है । जहां देखो बंहा जय श्री राधे कृष्णा का उदघोष सुनाई देता है ।मानो हवाओं के प्रवह से राधे कृष्णा शब्द सुनाईं दे रहे हों

सिरमौर जनपद के पवित्र पर्वतीय अंचल में स्थित पीडिया धार क्षेत्र का ग्राम फरोग (टिक्करी) इन दिनों गहन आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हो उठा है। यहां आरंभ हुई श्रीमद्भागवत कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की उस दिव्य परंपरा का जीवंत रूप है, जो मानव जीवन को धर्म, भक्ति और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करती है। पितरों की शांति एवं मोक्ष की कामना से प्रेरित इस भव्य कथा ज्ञान यज्ञ ने पूरे क्षेत्र को भक्ति-रस में सराबोर कर दिया है।

कथा का शुभारंभ अत्यंत विधि-विधान एवं श्रद्धा के साथ कलश यात्रा द्वारा हुआ, जो भारतीय धार्मिक परंपराओं में मंगल और शुद्धता का प्रतीक मानी जाती है। पड़िया धार के समीप स्थित पावन स्थल से प्रारंभ हुई यह यात्रा जब फरोग गांव की ओर बढ़ी, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो देवत्व स्वयं इस आयोजन का साक्षी बन रहा हो। सिर पर कलश धारण किए महिलाओं का भजन-कीर्तन करते हुए चलना, उनके मुख से निकले हरिनाम संकीर्तन की ध्वनि, वातावरण को दिव्यता से परिपूर्ण कर रही थी। यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और सामूहिक आस्था का अद्भुत संगम था।

मार्ग में ग्रामवासियों द्वारा जिस प्रकार इस यात्रा का स्वागत किया गया, वह भारतीय संस्कृति में “अतिथि देवो भव” और धर्म के प्रति गहन आस्था का प्रतीक है। हर द्वार पर पुष्प वर्षा, श्रद्धालुओं का अभिनंदन और भक्तिमय वातावरण यह दर्शाता है कि यह आयोजन केवल एक गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामूहिक चेतना का उत्सव बन चुका है।

इस पावन कथा का वाचन आचार्य व्यास वरुण शर्मा जी के श्रीमुख से हो रहा है, जिनके वचनों में वेद-पुराणों का सार और भक्ति की मधुरता झलकती है। उन्होंने अपने प्रवचनों में कहा कि श्रीमद्भागवत कथा केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का अमृत है, जो जीवात्मा को संसारिक मोह-माया से मुक्त कर ईश्वर के सान्निध्य में ले जाता है। कथा श्रवण से मन की अशांति समाप्त होती है, अंतःकरण शुद्ध होता है और व्यक्ति के भीतर भक्ति का दीप प्रज्वलित होता है।

धार्मिक दृष्टि से श्रीमद्भागवत कथा का विशेष महत्व है, क्योंकि यह केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है। इसमें वर्णित भगवान की लीलाएं, भक्तों की अटूट श्रद्धा और धर्म के आदर्श, मनुष्य को सत्य, प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि इस कथा को “कलियुग का कल्पवृक्ष” कहा गया है, जिसके श्रवण मात्र से ही पापों का क्षय और पुण्य का संचय होता है।
इस आयोजन का एक विशेष पक्ष यह भी है कि इसे ग्रामवासियों ने सामूहिक रूप से अपने पितरों की शांति हेतु आयोजित किया है। सनातन धर्म में पितृ ऋण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, और पितरों की आत्मा की शांति के लिए किए गए ऐसे धार्मिक अनुष्ठान न केवल पूर्वजों को तृप्त करते हैं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के जीवन में भी सुख-समृद्धि और शांति का संचार करते हैं। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि आज भी ग्रामीण समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और धर्म के प्रति उसकी आस्था अटूट है।
कथा के प्रथम दिवस ही श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोगों के हृदय में धर्म के प्रति कितना गहरा अनुराग है। प्रतिदिन दोपहर 12:30 बजे से 3:30 बजे तक होने वाली कथा में श्रद्धालु पूरे मनोयोग से भाग ले रहे हैं, भजन-कीर्तन में लीन होकर ईश्वर का स्मरण कर रहे हैं और आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित कर रहे हैं।

यह धार्मिक अनुष्ठान आगामी दिनों तक निरंतर चलता रहेगा और 30 अप्रैल को विधिवत पूर्णाहुति एवं भंडारे के साथ संपन्न होगा। पूर्णाहुति का दिन विशेष महत्व रखता है, जब समस्त यज्ञ क्रियाएं पूर्ण होकर ईश्वर से लोककल्याण की प्रार्थना की जाती है। भंडारा, जिसमें सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप भोजन कराया जाता है, समता और सेवा भाव का प्रतीक है।
अंततः यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में एकता, भाईचारे और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देने वाला महोत्सव है। ग्रामवासियों का यह प्रयास न केवल उनके पितरों के प्रति श्रद्धा का परिचायक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी धर्म और संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। सभी श्रद्धालुओं से आग्रह है कि वे इस पुण्य अवसर पर उपस्थित होकर कथा का श्रवण करें, धर्म लाभ अर्जित करें और अपने जीवन को आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित करें।

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!