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धारावाहिक (51)भारत माता की स्वतंत्रता हेतु सर्वस्व अर्पित करने वाले महान सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का अद्वितीय त्याग, राष्ट्र निर्माण और संगठन शक्ति की प्रेरक गाथा

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्र सैनानी सैनानीयों को कोटि कोटि नमन-इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स

भारत माता की स्वतंत्रता कोई संयोग नहीं, बल्कि अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तप और बलिदान की अमर गाथा है। इन वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर, अपने सुख-चैन को त्यागकर और जीवन की हर सांस को राष्ट्र के नाम अर्पित कर गुलामी की जंजीरों को तोड़ा। ऐसे ही महान सेनानियों में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का नाम श्रद्धा और गर्व के साथ लिया जाता है, जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि समाज को संगठित कर राष्ट्र जागरण का एक नया मार्ग भी प्रशस्त किया।
1 अप्रैल 1889 को नागपुर की पावन भूमि पर जन्मे डॉ. हेडगेवार बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के साथ-साथ कोलकाता से चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की, लेकिन उनका हृदय राष्ट्र सेवा के लिए धड़कता रहा। विद्यार्थी जीवन में ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए और देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प ले लिया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लेकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज बुलंद की और जेल भी गए। उनका संपर्क महान क्रांतिकारियों जैसे अरविंद घोष और भाई परमानंद से रहा, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने राष्ट्रभक्ति की लौ और प्रज्वलित की। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आंदोलनों में भी सक्रिय रहे और ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष से जनमानस को जागृत किया।
वर्ष 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। उनका उद्देश्य केवल एक संगठन बनाना नहीं था, बल्कि एक ऐसे सशक्त, अनुशासित और जागरूक समाज का निर्माण करना था, जो राष्ट्र की स्वतंत्रता और एकता के लिए सदैव समर्पित रहे। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र निर्माण में लगाया और समाज को आत्मबल, संगठन और संस्कारों का संदेश दिया।
डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व अत्यंत सादा, त्यागमयी और प्रेरणादायक था। उन्होंने न कभी व्यक्तिगत सुख की कामना की और न ही किसी पद या प्रतिष्ठा की इच्छा रखी। उनके लिए राष्ट्र ही सर्वोपरि था, और इसी भावना से उन्होंने अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया।
21 जून 1940 को उनका देहावसान हुआ, किंतु उनके विचार, उनका संगठन और उनका त्याग आज भी जीवंत है। वे उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र देखने का सपना ही नहीं देखा, बल्कि उसे साकार करने के लिए अपना पूरा जीवन न्यौछावर कर दिया।
ऐसे अमर बलिदानी को शत-शत नमन, जिनकी प्रेरणा आज भी हर भारतीय के हृदय में देशभक्ति की ज्योति प्रज्वलित करती है।

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