न्यूज़ इंडिया आजतक मुख्यकार्यालय भरमाड़ (जवाली)
राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला जवाली 163 बर्ष पूरव अस्तित्व में आया था जब भारत गुलामी की जंजीरो में जकडा था यह पाठशाल केई एतिहासिक घटनाओं का गवाह है । इसका मर्ज होना लोगों की समझ से वाहिर है जवाली में इन दिनों सन्नाटा नहीं, आक्रोश बोल रहा है।धरोहर पाठशालाओं को मर्ज करने के निर्णय ने एक बार फिर सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला जवाली को पीएम श्री राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला में विलय किए जाने के फैसले ने पूरे क्षेत्र को आंदोलित कर दिया है। स्कूल प्रबंधन समिति, अभिभावक, व्यापारी और आम नागरिक—सभी इसे केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जवाली की पहचान पर चोट मान रहे हैं।
लोगों का कहना है कि यह कदम सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जिससे जवाली के अस्तित्व को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। वर्षों से बाजार की रौनक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र रहा कन्या विद्यालय अब इतिहास बनने की कगार पर है। स्थानीय दुकानदारों का तर्क है कि छात्राओं की आवाजाही से ही बाजार में जीवन था; अब वह रौनक भी छिन जाएगी। “यदि स्कूल ही नहीं रहेगा, तो बाजार किसके भरोसे जिएगा?”—यह सवाल हर चौपाल और दुकान पर सुनाई दे रहा है।
अभिभावकों की नाराजगी और भी गहरी है। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी बेटियों को कन्या विद्यालय में इसलिए दाखिल कराया था ताकि वे सुरक्षित और सहज वातावरण में पढ़ सकें। अब सहशिक्षा व्यवस्था में अचानक बदलाव से वे असहज हैं। उनका मानना है कि यह निर्णय बिना व्यापक जनसंवाद के लिया गया, जिससे छात्राओं पर मानसिक दबाव बढ़ा है। परीक्षा नजदीक हैं और बच्चियां असमंजस में हैं कि उनका भविष्य किस दिशा में जाएगा।
एक और बड़ा मुद्दा बोर्ड का है। पीएम श्री स्कूल के सीबीएसई पैटर्न और कन्या विद्यालय के हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम के बीच अंतर को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। अभिभावक चाहते हैं कि विद्यालय को Himachal Pradesh Board of School Education के अधीन ही संचालित रहने दिया जाए। उनका कहना है कि बच्चों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम और परीक्षाओं की तैयारी को अचानक बदल देना उचित नहीं।
स्थानीय लोगों ने सरकार और क्षेत्रीय मंत्री चौधरी चंद्र कुमार के खिलाफ खुलकर रोष व्यक्त किया। उनका कहना है कि यह कैसा “व्यवस्था परिवर्तन” है, जिसमें जनता की भावनाओं को दरकिनार कर फैसले थोपे जा रहे हैं? लोगों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी सूरत में स्कूल को मर्ज नहीं होने देंगे और इसके विरोध में ज्ञापन एसडीएम जवाली के माध्यम से मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर को भेजा जाएगा।
जवाली की गलियों में इन दिनों यही चर्चा है कि यदि धरोहर संस्थानों को इसी तरह एक-एक कर समाप्त किया गया, तो कस्बे अपनी पहचान कैसे बचाएंगे? यह केवल एक स्कूल का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे की रक्षा का मुद्दा बन चुका है।अब नजर सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी है—क्या जनभावनाओं का सम्मान होगा या फिर यह आक्रोश और उग्र रूप लेगा?

