Reading: हिमाचल में सरकारी पाठशालाओं का अस्तित्व संकट में, घटती छात्र संख्या, मर्ज नीति और बढ़ता निजी वर्चस्व—शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न, जवाबदेही तय करने का समय अब।

हिमाचल में सरकारी पाठशालाओं का अस्तित्व संकट में, घटती छात्र संख्या, मर्ज नीति और बढ़ता निजी वर्चस्व—शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न, जवाबदेही तय करने का समय अब।

RamParkash Vats
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संकेतिक चित्र

धरोहर से मर्ज तक: हिमाचल की सरकारी पाठशालाओं पर संकट क्यों……?.. दोषी कौन..?

हिमाचल प्रदेश, जिसे कभी शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता था, आज एक गंभीर मोड़ पर खड़ा है। पहाड़ों की गोद में बसे इस राज्य ने साक्षरता और विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की थीं, परंतु विगत बीस वर्षों में सरकारी पाठशालाओं का गिरता स्तर चिंता का विषय बन गया है। अब स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि पहले विद्यालय बंद हुए, फिर “मर्ज” की नीति के तहत अनेक ऐतिहासिक पाठशालाओं का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर पर भी प्रश्नचिह्न है।

शिक्षा का गिरता स्तर: विफलता या अनदेखी?

गत दो दशकों में सरकारी पाठशालाओं की गुणवत्ता निजी विद्यालयों की तुलना में निरंतर कमजोर हुई है। यह केवल संसाधनों का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टिकोण और प्राथमिकता का विषय भी है। क्या इसे शिक्षा विभाग और सरकार की विफलता माना जाए या फिर यह जानबूझकर की गई अनदेखी है? जब किसी व्यवस्था में निरंतर गिरावट हो और सुधार की ठोस पहल न दिखाई दे, तो संदेह स्वाभाविक है।सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या घटती रही, परंतु समय रहते इस पर गंभीर चिंतन नहीं हुआ। इसके विपरीत निजी विद्यालयों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या आसमान छूती गई। यह अंतर केवल प्रचार का नहीं, बल्कि विश्वास का है।

निजी पाठशालाओं का बढ़ता आकर्षण

निजी विद्यालयों में आधुनिक कक्षाएँ, स्मार्ट बोर्ड, खेल मैदान, स्वच्छ शौचालय, परिवहन सुविधा और अनुशासित वातावरण उपलब्ध है। वहाँ अध्यापक प्रशिक्षित और उत्तरदायी दिखाई देते हैं। अभिभावकों को यह भरोसा होता है कि उनके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी।इसके विपरीत, अनेक सरकारी पाठशालाओं में मूलभूत सुविधाओं का अभाव, शिक्षक की कमी, और प्रशासनिक अव्यवस्था देखने को मिलती है। जब माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य देखते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से उस विकल्प को चुनते हैं जहाँ उन्हें स्थिरता और गुणवत्ता दिखे।

घटती छात्र संख्या आंकड़ों की चेतावनी को किया नजरान्दाज …. क्यों

सरकार और शिक्षा विभाग पिछले बीस वर्षों में सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या को रोकने में असफल रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों में पहली से पाँचवीं तक की कक्षाओं में बच्चों की संख्या चिंताजनक स्तर पर पहुँच चुकी है। मिडिल स्कूल अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, जबकि उच्च पाठशालाओं के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है।कभी जिन विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या सैकड़ों में होती थी, आज वहाँ नाममात्र बच्चे रह गए हैं। आय “चवन्नी” और खर्च “सौ रुपये” जैसी स्थिति बन गई है। ऐसे में सरकार ने समाधान के रूप में मर्ज की नीति अपनाई, परंतु क्या यह स्थायी समाधान है या समस्या को ढकने का प्रयास?

ऐतिहासिक विद्यालयों का मर्ज प्रहार… क्यों

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब वे विद्यालय भी मर्ज कर दिए जाते हैं जिनका संबंध स्वतंत्रता सेनानियों और ऐतिहासिक परंपराओं से रहा है।उदाहरणस्वरूप—ज्वाली स्कूल (163 वर्ष पुराना)देहरा कन्या स्कूल (72 वर्ष पुराना)वायज स्कूल धर्मशाला (100 वर्ष पुराना)इंदौरा हाई स्कूल (54 वर्ष पुराना)रावमापा पालमपुर (150 वर्ष पुराना)नूरपुर हाई स्कूल (150 वर्ष पुराना)इन पाठशालाओं का केवल भवन नहीं, बल्कि एक गौरवशाली इतिहास, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान रही है। इनका मर्ज होना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों का विलुप्त होना है।

शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक बोझ…. क्यों

अनेक अभिभावकों से बातचीत में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों को पढ़ाने से अधिक समय गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना पड़ता है—चुनाव ड्यूटी, जनसंख्या सर्वेक्षण, स्वास्थ्य अभियानों में सहयोग, सरकारी योजनाओं का प्रचार आदि। जबकि ये कार्य बेरोजगार युवाओं से भी कराए जा सकते हैं।जब शिक्षक कक्षा में कम और प्रशासनिक कार्यों में अधिक समय देंगे, तो पढ़ाई प्रभावित होगी ही। इससे अभिभावकों में यह संदेश जाता है कि विद्यालय की प्राथमिकता शिक्षा नहीं, बल्कि सरकारी दायित्वों की पूर्ति है।

स्थानांतरण और अव्यवस्था ने भी लोगों का मोह भंग किया

एक पद के लिए बार-बार तबादले, न्यायालयी विवाद और प्रशासनिक खींचतान विद्यालयों को युद्ध का मैदान बना देते हैं। शिक्षक अस्थिरता में काम करते हैं, जिसका सीधा प्रभाव छात्रों पर पड़ता है। स्थायित्व के अभाव में गुणवत्ता की अपेक्षा करना कठिन है। जव पढाई चरमसीमा पर होती है तो अध्यापकों का तबादला कर दिया जाता है जिसके चलते कई वारअभिभावकों व पाठशालाओं में पढ रहे बिधार्थी संघर्ष पर उतर आते है। कई बार अध्यापक का पढाने का ढंग बच्चों के हिदय को छू जाता है जब उसका तबादला होता है तो बच्चों का दिल टूट जाता है ।

मेरा उतरदायित्व व निस्वार्थ भावना से शिक्षा को अपना कर्म क्षेत्र समझकर कई अध्यापकों ने असंभव को संभव कर दिखाया

निस्वार्थ भावना से शिक्षा को अपना कर्म क्षेत्र समझकर जव पाठशालाओं में बच्चों की तादाद कम हुई तो कई अध्यापकों ने स्वयं अपने वाहन से बच्चों को घर से लाकर पाठशालाओं को बंद होने से बचाया जनम हर संभव प्रयास किया पाठशालाओं में बच्चों की तादाद घटने के पीछे शिक्षा का संपूर्ण सिस्टम एवं सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकते

विश्वास का संकट बना मुख्य कारण

सब से बड़ा प्रश्न यह है कि सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों और नेताओं द्वारा अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना क्या संकेत देता है? जब नीति निर्माता स्वयं सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास नहीं करते, तो आम जनता से विश्वास की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यह प्रवृत्ति समाज में नकारात्मक संदेश देती है और सरकारी शिक्षा की साख को कमजोर करती है।

प्रोत्साहन योजनाएँ और वास्तविकता:

-सरकार द्वारा विद्यार्थियों को टैबलेट जैसी योजनाओं से प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है। यह स्वागतयोग्य कदम है, परंतु केवल उपकरण देने से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ती। आवश्यक है प्रशिक्षित शिक्षक, नियमित कक्षाएँ, और समर्पित शैक्षणिक वातावरण।

समाधान की दिशा एक कदम

समस्या का समाधान विद्यालयों को मर्ज करने में नहीं, बल्कि उन्हें पुनर्जीवित करने में है। आवश्यक है—शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना।आधारभूत सुविधाओं में सुधार।प्रशिक्षित और प्रेरित अध्यापक नियुक्त करना। स्थानांतरण नीति में पारदर्शिता और स्थिरता।नेताओं और अधिकारियों द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करना।ऐतिहासिक विद्यालयों को “हेरिटेज स्कूल” का दर्जा देकर विशेष संरक्षण देना।

प्रश्न आज भी वही है—दोषी कौन? और उससे भी बड़ा प्रश्न—उत्तरदायित्व कौन लेगा?

शिक्षा केवल भवनों का नाम नहीं, बल्कि भविष्य का निर्माण है। यदि धरोहर पाठशालाएँ ही समाप्त हो जाएँगी, तो आने वाली पीढ़ियों को हम क्या विरासत देंगे? हिमाचल को पुनः शिक्षा के शिखर पर पहुँचाने के लिए अब केवल निर्णय नहीं, बल्कि संकल्प और साहस की आवश्यकता है। सारगर्भित है कि हिमाचल प्रदेश की सरकारी पाठशालाओं की दुर्दशा केवल शिक्षा विभाग की नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व का विषय है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।

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