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बिजली संशोधन बिल 2025 के खिलाफ ज्वाली में उबाल — क्या हिमाचल के साथ हो रहा है अन्याय?

RamParkash Vats
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न्यूज डिया आजतक
मुख्य कार्यालय: हिमाचल
न्यूज़ डेस्क संपादक: राम प्रकाश वत्स
स्थान ज्वाली, 12 फरवरी 2026

। हिमाचल प्रदेश के शांत पहाड़ों में आज आक्रोश की गूंज सुनाई दी। हिमाचल प्रदेश विद्युत बोर्ड ज्वाइंट एक्शन कमेटी—इम्प्लाइज, इंजीनियरिंग और पेंशनर संगठनों के आह्वान पर ज्वाली विद्युत मंडल के मुख्य द्वार से कोट रोड तक भोजन अवकाश के दौरान जोरदार रैली निकाली गई। प्रदर्शनकारियों ने एसडीएम ज्वाली के माध्यम से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भेजकर प्रस्तावित बिजली संशोधन बिल 2025 का कड़ा विरोध दर्ज कराया।
प्रदर्शन में शामिल कर्मचारियों, इंजीनियरों और पेंशनरों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विधेयक देश के बिजली बोर्डों को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में खतरनाक कदम है। विद्युत बोर्ड पेंशनर फोरम के राज्य उपाध्यक्ष पवन मोहल और पावर वेलफेयर एसोसिएशन नूरपुर के प्रधान सतीश धीमान ने संयुक्त बयान में आरोप लगाया कि यह बिल जनता, किसानों, कर्मचारियों और पेंशनरों—किसी के भी हित में नहीं है। उनका कहना था कि बिजली जैसी बुनियादी सार्वजनिक सेवा को मुनाफे के तराजू पर तौलना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

वर्तमान व्यवस्था में बड़े उपभोक्ताओं से अधिक दर लेकर गरीब और कमजोर वर्ग को राहत दी जाती है, लेकिन संशोधन के बाद यह संतुलन समाप्त हो जाएगा। मल्टी लाइसेंसी व्यवस्था के तहत निजी कंपनियां केवल लाभ वाले क्षेत्रों का चयन करेंगी, जबकि घाटे वाले ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्र सरकारी कंपनियों पर छोड़ दिए जाएंगे। इससे बिजली बोर्ड आर्थिक रूप से और कमजोर होगा तथा अंततः बोझ आम उपभोक्ता पर ही पड़ेगा।
स्मार्ट मीटर और प्रीपेड प्रणाली को लेकर भी तीखा विरोध देखने को मिला। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिजली जैसी आवश्यक सेवा को “रिचार्ज सुविधा” में बदलना गरीब और सीमित आय वर्ग के साथ अन्याय है। उन्होंने दो टूक कहा कि स्मार्ट मीटर किसी भी सूरत में घरों में नहीं लगने दिए जाएंगे।
पेंशनरों का रोष भी खुलकर सामने आया। फोरम के प्रधान राम लुभाया और अन्य पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि मार्च 2024 के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अब तक ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट का भुगतान नहीं किया गया। 2016 से 2022 के बीच सेवानिवृत्त कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान के आधार पर देय राशि भी लंबित है। यहां तक कि 50,000 रुपये की पहली किस्त भी जारी नहीं की गई। इससे पेंशनरों में भारी असंतोष है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि राजस्व घाटा अनुदान बंद होने का हवाला देकर राज्य सरकार बिजली बोर्ड को निजी हाथों में सौंपने का रास्ता बना रही है। कर्मचारियों ने चुनौती दी कि यदि सरकार बोर्ड नहीं संभाल सकती तो एक वर्ष के लिए इसकी जिम्मेदारी कर्मचारियों और पेंशनरों को सौंप दे—वे इसे लाभ में लाकर दिखाएंगे।
ज्वाली की यह रैली केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि हिमाचल की अस्मिता और अधिकारों की आवाज बनकर उभरी है।

सवाल यह है कि क्या विकास के नाम पर प्रदेश की जनता की बुनियादी सुरक्षा और सामाजिक संतुलन से समझौता किया जाएगा? हिमाचल के लोग जवाब चाहते हैं—और वह भी

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