Head Office, Bharmaad ( Jawali) News Room Brainstorming, Reflection and Analysis, Editor Ram Prakash Vats
हिमाचल की राजनीति में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को लेकर छिड़ी तकरार अब केवल बयानबाज़ी नहीं रही, बल्कि यह प्रदेश की वित्तीय आत्मनिर्भरता और केंद्र–राज्य संबंधों की गंभीर बहस में बदलती जा रही है। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह और आयुष मंत्री यादविंद्र गोमा द्वारा भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर पर लगाए गए आरोप इसी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा हैं।
सबसे पहले मूल प्रश्न—क्या आरडीजी वास्तव में “खैरात” है या संवैधानिक अधिकार? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत राज्यों को राजस्व घाटे की भरपाई के लिए अनुदान का प्रावधान है। हिमाचल जैसे विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले पर्वतीय राज्य के लिए यह प्रावधान जीवनरेखा जैसा है। ऐसे में यदि आरडीजी को बंद करने या सीमित करने की आशंका है, तो स्वाभाविक है कि राज्य सरकार इसे राजनीतिक नहीं बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बताए।
मंत्रियों ने अनुराग ठाकुर से यह मांग कर राजनीतिक आक्रामकता दिखाई है कि यदि केंद्र ने 20 वर्ष पहले आरडीजी बंद करने का निर्णय लिया था तो संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। यह चुनौती राजनीतिक रूप से प्रभावी है, क्योंकि दस्तावेज़ी प्रमाण के बिना कोई भी दावा जनमानस में संदेह पैदा करता है। वहीं भाजपा का तर्क यह हो सकता है कि वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर अनुदानों की प्रकृति बदलती रहती है। ऐसे में तथ्य और समय-सीमा स्पष्ट करना दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।
पूर्व भाजपा सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन, 70,000 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के दुरुपयोग, खाली पड़े भवनों के निर्माण और उद्योगपतियों को रियायती भूमि आवंटन जैसे आरोप गंभीर हैं। यदि इनमें तथ्यात्मक आधार है तो यह केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का विषय है। सोलन के नालागढ़ में कथित रूप से 5,000 करोड़ रुपये मूल्य की भूमि रियायतों के साथ देने का मामला पारदर्शिता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। उद्योग प्रोत्साहन और संसाधनों की सुरक्षा के बीच संतुलन आवश्यक है—अंधाधुंध छूट भविष्य में राजस्व संकट को जन्म दे सकती है।
दूसरी ओर, वर्तमान सरकार का यह दावा कि सीमित संसाधनों के बावजूद उसने 26,683 करोड़ रुपये जुटाए और कर्ज प्रबंधन में अनुशासन रखा, स्वयं में सकारात्मक संकेत है। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि प्रदेश का बढ़ता ऋणभार दीर्घकालिक चुनौती बना हुआ है। केवल पिछली सरकार पर दोषारोपण से समाधान नहीं निकलेगा; ठोस वित्तीय सुधार, व्यय नियंत्रण और राजस्व सृजन की दीर्घकालिक रणनीति आवश्यक है।
सर्वदलीय बैठक में भाजपा के वॉकआउट को कांग्रेस “हिमाचल विरोधी चेहरा” बता रही है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक नौटंकी कह सकती है। किंतु जनता के दृष्टिकोण से सवाल सीधा है—क्या सभी दल मिलकर केंद्र से प्रदेश के हितों की पैरवी करेंगे या आरोप-प्रत्यारोप में अवसर गंवाते रहेंगे?
संपादकीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि आरडीजी का मुद्दा केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हिमाचल की वित्तीय स्थिरता, पारदर्शिता और राजनीतिक परिपक्वता की परीक्षा है। जनता को गुमराह करने के बजाय दोनों पक्षों को तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए। हिमाचल की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका संवैधानिक हक सुरक्षित है या राजनीतिक बहस की भेंट चढ़ रहा है।
राजनीति में आरोप स्वाभाविक हैं, परंतु राज्यहित सर्वोपरि होना चाहिए। यदि यह मुद्दा सचमुच संवैधानिक अधिकार का है, तो उसे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर लड़ना ही हिमाचल की सच्ची सेवा होगी।

