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“10 वर्ष से कम सेवाकाल वाले रिटायर्ड कर्मचारियों औका धैर्य जवाब दे रहा, डॉ. संजीव गुलेरिया ने सरकार को चेताया—हक छीना तो सड़कों पर होगा बड़ा आंदोलन”

RamParkash Vats
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न्यूज इंडिया आजतक, हिमाचल न्यूज डैक्स प्रकाश वत्स

“हिमाचल प्रदेश में 10 वर्ष से कम सेवाकाल वाले रिटायर्ड कर्मचारियों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। जिस कर्मचारी वर्ग ने वर्षों तक सरकार की नीतियों को धरातल पर उतारने का काम किया, आज वही वर्ग अपने हक के लिए अदालतों और सरकार के दरवाजों पर ठोकरें खाने को मजबूर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कर्मचारियों के अधिकारों को कुचलना ही सरकार की प्राथमिकता बन गई है?

विनाश काले विपरीत बुद्धि”—यह कहावत आज हिमाचल की व्यवस्था पर सवाल बनकर खड़ी दिखाई देती है। ‘न्यू पेंशन स्कीम 10 वर्ष से कम सेवाकाल वाले रिटायर्ड कर्मचारी अधिकारी महासंघ’ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजीव गुलेरिया का आरोप है कि सरकार कर्मचारियों के साथ न्याय करने के बजाय टकराव की राह पर चल रही है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संवेदनहीनता का भी उदाहरण है।

बताया जा रहा है कि कर्मचारियों के वित्तीय हितों को प्रभावित करने वाला ‘कर्मचारी एक्ट 2024’ पहले ही न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं पाया। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 26 अप्रैल 2026 को सैकड़ों याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए सरकार को अनुबंध लाभ देने के निर्देश दिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अदालत अपना स्पष्ट रुख दे चुकी है, तब भी कर्मचारियों को उनका हक मिलने में देरी क्यों?

रिटायर्ड कर्मचारियों के बीच यह नाराजगी तेजी से बढ़ रही है कि सरकार एक ओर आर्थिक तंगी का हवाला देती है, वहीं दूसरी ओर कानूनी लड़ाइयों पर भारी-भरकम खर्च करने से पीछे नहीं हटती। कर्मचारियों के बीच यह भावना घर कर रही है कि उनकी गाढ़ी कमाई और भविष्य की सुरक्षा को राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों की भेंट चढ़ाया जा रहा है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन लोगों ने जीवन का बड़ा हिस्सा सरकारी सेवा में लगाया, वही बुजुर्ग कर्मचारी अब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। यह केवल पेंशन या वित्तीय लाभ का मुद्दा नहीं, बल्कि सम्मान और भरोसे का सवाल भी है। यदि सरकार कर्मचारियों की पीड़ा को नहीं समझेगी, तो असंतोष का यह ज्वार बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।

सरकार को यह समझना होगा कि अदालतों में लड़ाई लड़कर समय बिताने से समस्या का समाधान नहीं होगा। संवाद, संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण निर्णय ही रास्ता है। कर्मचारियों के सब्र का बांध अगर टूट गया, तो यह केवल एक वर्ग का आक्रोश नहीं होगा, बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का विस्फोट भी साबित हो सकता है।

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