Reading: धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (22)- 1857 की क्रांति की ज्वाला बनी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, हड़प नीति को चुनौती देकर अंग्रेजों से लड़ीं, रणभूमि में वीरगति पाकर अमर हुईं साहस, स्वाभिमान और बलिदान की प्रतीक

धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (22)- 1857 की क्रांति की ज्वाला बनी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, हड़प नीति को चुनौती देकर अंग्रेजों से लड़ीं, रणभूमि में वीरगति पाकर अमर हुईं साहस, स्वाभिमान और बलिदान की प्रतीक

RamParkash Vats
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धारावाहिक (21) भारत के स्वतंत्र सैनानी संपादक राम प्रकाश वत्स

रानी लक्ष्मीबाई भारतीय इतिहास की वह ज्योति हैं, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय साहस, नेतृत्व और आत्मबलिदान का परिचय दिया। ‘झांसी की रानी’ के नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों के सामने झुकने से इंकार कर दिया और मातृभूमि की रक्षा के लिए रणभूमि में उतर गईं। उनका जीवन केवल एक रानी की कथा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और स्त्री-शक्ति का प्रतीक है।
उनका जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ। बचपन का नाम ‘मणिकर्णिका’ था, पर घर में उन्हें प्यार से ‘मनु’ कहा जाता था। उनके पिता मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में कार्यरत थे। माता भागीरथीबाई धार्मिक और संस्कारी थीं। बाल्यकाल से ही मनु निर्भीक, चंचल और जिज्ञासु स्वभाव की थीं। उन्होंने पारंपरिक स्त्री शिक्षा तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि घुड़सवारी, तलवारबाजी और धनुर्विद्या में भी निपुणता हासिल की। यही गुण आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बने।
सन 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ और वे लक्ष्मीबाई नाम से जानी गईं। विवाह के बाद वे झांसी की रानी बनीं। कुछ वर्षों पश्चात उनके पुत्र का जन्म हुआ, किंतु दुर्भाग्यवश वह जीवित न रह सका। बाद में उन्होंने दामोदर राव को गोद लिया। इसी बीच अंग्रेजों ने अपनी ‘हड़प नीति’ लागू कर दी, जिसके तहत ऐसे राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था जिनका कोई जैविक उत्तराधिकारी न हो। गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने झांसी को हड़पने का निर्णय लिया और दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया।
यह निर्णय रानी लक्ष्मीबाई के लिए अस्वीकार्य था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा— “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।” यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का उद्घोष था। 1857 में जब मेरठ से विद्रोह की चिंगारी भड़की और देश के अनेक हिस्सों में क्रांति की लहर फैल गई, तब झांसी भी इस आंदोलन का केंद्र बन गया। रानी ने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए झांसी की सुरक्षा मजबूत की और सेना का संगठन किया। महिलाओं को भी युद्धकला का प्रशिक्षण दिया गया। झलकारी बाई जैसी वीरांगनाएं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं।
मार्च 1858 में अंग्रेज जनरल ह्यू रोज़ ने झांसी पर आक्रमण किया। अंग्रेजी सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस थी, जबकि झांसी की सेना सीमित संसाधनों के साथ लड़ रही थी। कई दिनों तक भीषण युद्ध चला। रानी स्वयं घोड़े पर सवार होकर सैनिकों का नेतृत्व करती रहीं। जब किला टूटने की स्थिति में पहुंचा, तब उन्होंने अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधा और घोड़े ‘बादल’ पर सवार होकर किले से बाहर निकल गईं। यह दृश्य भारतीय इतिहास में अमर हो गया।
झांसी से निकलकर वे कालपी पहुंचीं और वहां तात्या टोपे सहित अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर संघर्ष जारी रखा। बाद में उन्होंने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। किंतु 18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटा-की-सराय में अंग्रेजों से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। कहा जाता है कि अंतिम क्षण तक उन्होंने तलवार नहीं छोड़ी।
रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान 1857 के संग्राम की सबसे प्रेरक घटनाओं में से एक बना। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किसी एक वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं है। एक युवा रानी ने साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती दी और इतिहास में अमिट छाप छोड़ दी।
आज भी उनका नाम साहस और देशभक्ति का पर्याय है। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियां— “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी”— उनकी वीरता को शब्दों में अमर कर देती हैं। रानी लक्ष्मीबाई केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना ही सच्ची वीरता है, और मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान भी छोटा पड़ जाता है।

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