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धारावाहिक (19)भारत के स्वतंत्र सैनानी मेजर दुर्गा मल्ल: आज़ाद हिन्द फौज के प्रथम गोरखा शहीद का अमर बलिदान

RamParkash Vats
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धाराबाहिक (19) भारत के स्वतंत्र सैनानी लेखक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में जनजागरण का सूत्रपात “डूम” अथवा “असहयोग” आंदोलनों से हुआ। इन आंदोलनों का उद्देश्य देशी रियासतों में प्रचलित बेगार प्रथा, अत्यधिक भूमिकर और भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचारों का विरोध करना था। 1859 से 1939 तक कांगड़ा, मंडी, कुल्लू, सिरमौर, बुशहर और रामपुर सहित अनेक क्षेत्रों में जनता संगठित होकर अन्याय के विरुद्ध खड़ी हुई। इन प्रयासों से ब्रिटिश सरकार और रियासती शासकों पर सुधारों का दबाव बना।
1939 में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की और ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में झोंकने का विरोध किया, तब देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाने का आह्वान हुआ। कांगड़ा के धर्मशाला, पालमपुर, नूरपुर और नादौन जैसे क्षेत्रों में युवाओं ने तिरंगा फहराकर राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया। 1942 में सिंगापुर में आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना हुई, जिसमें हिमाचल के लगभग चार हजार सैनिक सम्मिलित हुए। “कदम-कदम बढ़ाए जा” जैसे गीतों और “दिल्ली चलो” के नारे ने युवाओं में नई ऊर्जा भरी।
इसी पृष्ठभूमि में मेजर दुर्गामल का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। 1 जुलाई 1913 को देहरादून के डोईवाला में जन्मे दुर्गामल प्रारंभ से ही तेजस्वी और देशभक्त थे। छात्र जीवन में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1931 में वे 2/1 गोरखा राइफल्स में भर्ती हुए और अपनी प्रतिभा से सिग्नल हवलदार बने। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनकी यूनिट मलाया और सिंगापुर भेजी गई, जहाँ जापान के हाथों ब्रिटिश सेना की पराजय के बाद वे कैदी बने।
कैप्टन मोहन सिंह और बाद में नेताजी के नेतृत्व में गठित आज़ाद हिन्द फौज में दुर्गामल ने सक्रिय भूमिका निभाई। वे गुप्तचर विभाग में टुकड़ी कमांडर बने और साहसपूर्वक शत्रु क्षेत्र में जानकारी एकत्र करते रहे। 27 मार्च 1944 को इम्फाल मोर्चे पर वे पकड़े गए। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें प्रलोभन देकर माफी मांगने को कहा, किंतु उन्होंने अस्वीकार कर दिया। दिल्ली के लालकिले में सैन्य अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई।
25 अगस्त 1944 को मात्र 31 वर्ष की आयु में उन्होंने “जय हिन्द” के उद्घोष के साथ हंसते-हंसते फांसी स्वीकार की। उनके अंतिम शब्द थे—“मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, भारत अवश्य आज़ाद होगा।”
मेजर दुर्गामल का बलिदान हिमाचल और समूचे देश के लिए प्रेरणा स्रोत है। संसद भवन में उनकी प्रतिमा स्थापित है और उनकी पुण्यतिथि ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि हिमाचल की पावन धरती ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अमिट योगदान दिया।

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