धाराबाहिक (18) भारत के स्वतंत्र सैनानी लेखक संपादक राम प्रकाश वत्स, स्वतंत्र सैनानीयों कोर्ट कोटि कोटि नमन

वीरता, शौर्य और समर्पण की जब भी बात होगी, ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जमवाल का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। 14 जून 1899 को जन्मे इस अदम्य साहस के धनी योद्धा ने 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में वह इतिहास रचा, जिसने जम्मू-कश्मीर की तकदीर बदल दी। वे जम्मू-कश्मीर राज्य बलों के चीफ ऑफ स्टाफ थे और संकट की उस घड़ी में एक सच्चे सेनानायक की तरह आगे बढ़े।अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तानी कबायली हमलावरों ने कश्मीर पर धावा बोला, तब स्थिति अत्यंत गंभीर थी। दुश्मन की संख्या हजारों में थी, जबकि ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के पास मात्र 150 से 260 सैनिक थे। लेकिन संख्या नहीं, संकल्प निर्णायक होता है—और उनका संकल्प अडिग था। महाराजा हरि सिंह ने उन्हें आदेश दिया था—“अंतिम आदमी और अंतिम गोली तक लड़ना।” उन्होंने इस आदेश को अपना धर्म मान लिया।23 से 26 अक्टूबर 1947 तक उरी सेक्टर में उन्होंने दुश्मन को डटकर रोके रखा। रणनीतिक पुलों को उड़ाकर उन्होंने हमलावरों की गति को धीमा किया और श्रीनगर की ओर बढ़ते खतरे को थाम लिया। चार दिनों तक चली इस भीषण लड़ाई ने इतिहास की दिशा मोड़ दी। उनके इस प्रतिरोध ने महाराजा हरि सिंह को भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने का अमूल्य समय दिया।26-27 अक्टूबर 1947 की रात, उरी-रामपुर सेक्टर में लड़ते हुए यह वीर सपूत मातृभूमि पर न्यौछावर हो गया। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। भारतीय सेना को श्रीनगर पहुंचने और घुसपैठियों को खदेड़ने का अवसर मिला। इसी अद्वितीय साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत स्वतंत्र भारत का वीरता,श्रीनगर के बादामी बाग छावनी के प्रवेश द्वार का नाम ‘ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह गेट’ रखकर राष्ट्र ने उनके बलिदान को नमन किया है।उनकी कहानी केवल युद्ध की गाथा नहीं, बल्कि कर्तव्य, राष्ट्रप्रेम और अदम्य साहस का जीवंत प्रतीक है। जब-जब कश्मीर की रक्षा की बात होगी, तब-तब यह अमर योद्धा हमारे हृदयों में प्रेरणा का दीप जलाता रहेगा।

