भारत के स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक (15) भारत के स्वतंत्र सैनानीयों के प्रति लेख संपादक राम प्रकाश वत्स
राष्ट्रभक्ति की गोद में जन्मा एक क्रांतिकारी मन
शहीद सुखदेव थापर का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस तेजस्वी परंपरा का प्रतीक है, जिसमें बाल्यकाल से ही देश के लिए जीने और मरने का संकल्प पलता है। 15 मई 1907 को पंजाब के लुधियाना स्थित नौघरा में जन्मे सुखदेव ने बचपन में ही जीवन का कठोर यथार्थ देख लिया। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता रामलाल थापर का साया उठ गया, किंतु यह अभाव उनके भीतर कमजोर नहीं, बल्कि अधिक दृढ़ राष्ट्रप्रेमी चेतना का बीज बन गया। उनके चाचा अचिंतराम, जो आर्य समाज के प्रबल समर्थक थे, ने सुखदेव के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वेद, स्वाध्याय, आत्मसम्मान और देशभक्ति के संस्कारों ने सुखदेव के बालमन में यह भावना जगा दी कि पराधीनता सबसे बड़ा पाप है और स्वतंत्रता सबसे बड़ा धर्म।

शिक्षा से क्रांति तक का वैचारिक सफर
लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ते हुए सुखदेव का संपर्क उस वैचारिक वातावरण से हुआ, जो अंग्रेजी शासन के विरुद्ध युवाओं को क्रांति के लिए प्रेरित कर रहा था। यहीं उनकी मित्रता भगत सिंह जैसे तेजस्वी विचारक से हुई। सुखदेव केवल भावनात्मक देशभक्त नहीं थे, बल्कि वे अध्ययनशील, तार्किक और वैचारिक क्रांतिकारी थे। उन्होंने विश्व की क्रांतिकारी आंदोलनों, समाजवाद और भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन किया। उनके लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि शोषणमुक्त, समानता आधारित समाज की स्थापना थी। यही कारण था कि वे संगठित क्रांति में विश्वास रखते थे और युवाओं को वैचारिक रूप से तैयार करने को सबसे बड़ा हथियार मानते थे।

HSRA और संगठन निर्माण का अद्वितीय योगदान
सुखदेव थापर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के उन स्तंभों में से थे, जिन्होंने संगठन को विचार, दिशा और विस्तार दिया। पंजाब में HSRA को मजबूत करने का श्रेय काफी हद तक सुखदेव को जाता है। वे गुप्त बैठकों, क्रांतिकारी साहित्य के वितरण और नए युवाओं की भर्ती में अग्रणी रहे। सुखदेव का मानना था कि बिना अनुशासन और संगठन के कोई भी क्रांति सफल नहीं हो सकती। वे रणनीतिक सोच रखते थे और हर कदम सोच-समझकर उठाते थे। भगत सिंह जहां विचारों के प्रखर प्रवक्ता थे, वहीं सुखदेव संगठनकर्ता और योजनाकार के रूप में क्रांति की रीढ़ बने।

लाहौर षड्यंत्र: प्रतिशोध नहीं, चेतना का विस्फोट
1928 में लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी शहादत ने सुखदेव के मन को भीतर तक झकझोर दिया। यह केवल एक नेता की हत्या नहीं थी, बल्कि पूरे राष्ट्र के स्वाभिमान पर आघात था। सुखदेव ने ही भगत सिंह और राजगुरु के साथ मिलकर इस अन्याय का प्रतिकार करने की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश अधिकारी जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या कोई व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि ब्रिटिश दमन के विरुद्ध क्रांतिकारी चेतावनी थी। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई, जिसने युवाओं में निर्भीकता और बलिदान की नई चेतना जगा दी।
नौजवान भारत सभा और युवा चेतना का जागरण
सुखदेव का विश्वास था कि भारत की आज़ादी युवाओं की जागृत चेतना से ही संभव है। इसी उद्देश्य से उन्होंने भगत सिंह के साथ ‘नौजवान भारत सभा’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संगठन केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि युवाओं को सामाजिक कुरीतियों, जातिवाद और अंधविश्वास से मुक्त कर एक वैज्ञानिक और समाजवादी दृष्टिकोण देने का माध्यम था। सभाओं, पर्चों और भाषणों के माध्यम से सुखदेव ने युवाओं को यह सिखाया कि सच्ची देशभक्ति का अर्थ है—न्याय, समानता और मानव गरिमा के लिए संघर्ष।

जेल, भूख हड़ताल और अदम्य साहस
गिरफ्तारी के बाद भी सुखदेव का साहस कम नहीं हुआ। जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध 1929 में उन्होंने ऐतिहासिक भूख हड़ताल में भाग लिया। यह संघर्ष केवल भोजन के अधिकार का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा का था। महीनों तक चली इस भूख हड़ताल ने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को उजागर कर दिया और पूरे देश में सहानुभूति की लहर दौड़ा दी। शारीरिक कष्ट, यातनाएँ और एकांत—कुछ भी सुखदेव के संकल्प को तोड़ नहीं सका। वे जानते थे कि उनका शरीर भले नश्वर हो, पर उनका विचार अमर रहेगा।
शहादत: मृत्यु नहीं, अमरता का उत्सव
23 मार्च 1931 की वह संध्या भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, जब लाहौर जेल में सुखदेव थापर, भगत सिंह और राजगुरु को फांसी दी गई। यह फांसी नहीं, बल्कि भारत माता के चरणों में दिया गया सर्वोच्च बलिदान था। सुखदेव ने हँसते-हँसते फंदे को चूमा, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि उनकी शहादत से स्वतंत्रता का सूरज अवश्य उगेगा। आज 23 मार्च ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की हर सांस उन अमर बलिदानों की देन है। शहीद सुखदेव थापर का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि निस्वार्थ बलिदान में प्रकट होती है।
शहीद सुखदेव थापर अमर रहें।उनका बलिदान युगों-युगों तक राष्ट्र को प्रेरणा देता रहेगा।

