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संपादकीय: आरोपों की आंधी में घिरा हिमाचल का सियासी परिदृश्य

RamParkash Vats
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संपादकीय :चिंतन, मंथन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश की राजनीति एक बार फिर तीखे आरोप–प्रत्यारोपों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष एवं कांगड़ा के विधायक पवन काजल द्वारा सुक्खू सरकार पर किया गया हमला केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया भर नहीं, बल्कि एक सुविचारित रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए। आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक निर्णयों और पंचायत चुनावों जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर भाजपा ने कांग्रेस सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है।
पंचायत चुनावों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने के निर्णय को भाजपा “ग्रामीण लोकतंत्र पर प्रहार” के रूप में प्रस्तुत कर रही है। काजल का आरोप है कि सरकार जनता के बीच जाने से बच रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है। यह आरोप राजनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली अवश्य है, क्योंकि पंचायतें हिमाचल की सामाजिक-राजनीतिक संरचना की धुरी हैं। किंतु यह भी ध्यान देने योग्य है कि न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेना संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में प्रश्न केवल नीयत का नहीं, बल्कि परिस्थितियों और कानूनी विवशताओं का भी है।
आर्थिक मोर्चे पर भाजपा का आक्रमण अधिक धारदार है। चुनावी गारंटियों, बढ़ते कर्ज और आरडीजी ग्रांट बंद होने जैसे मुद्दों को आधार बनाकर कांग्रेस सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह सत्य है कि हिमाचल की अर्थव्यवस्था पहले से ही वेतन, पेंशन और सीमित संसाधनों के दबाव में रही है। प्राकृतिक आपदाओं और राजस्व की सीमाओं ने स्थिति को और जटिल बनाया है। ऐसे में विपक्ष द्वारा “वित्तीय अनुशासन के विफल होने” का आरोप राजनीतिक विमर्श को और तीखा बना देता है।
दूसरी ओर, भाजपा केंद्र सरकार की उपलब्धियों—फोरलेन परियोजनाएं, वंदे भारत ट्रेन, एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालय—को रेखांकित कर विकास का श्रेय अपने पक्ष में स्थापित करना चाहती है। यह रणनीति स्पष्ट रूप से दोहरी रेखा खींचती है: विकास का श्रेय केंद्र को, और आर्थिक संकट का दोष राज्य सरकार को। कांग्रेस इसके विपरीत केंद्र पर वित्तीय सहयोग में कमी और भेदभाव का आरोप लगाती रही है। इस प्रकार, संघर्ष केवल नीतियों का नहीं बल्कि नैरेटिव का भी है।
राज्यपाल शासन की संभावना का उल्लेख राजनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। संवैधानिक रूप से यह एक असाधारण स्थिति में उठाया जाने वाला कदम है, किंतु राजनीतिक बयानबाज़ी में इसका प्रयोग कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और सरकार पर नैतिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
स्पष्ट है कि हिमाचल में आर्थिक चुनौतियां अब सियासी हथियार बन चुकी हैं। प्रदेश की जनता के लिए वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या यह टकराव समाधान की दिशा में बढ़ेगा या केवल चुनावी तैयारी तक सीमित रहेगा। लोकतंत्र की मजबूती आरोपों से नहीं, बल्कि पारदर्शी शासन, वित्तीय जिम्मेदारी और सहकारी संघवाद से सुनिश्चित होती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सियासी गर्माहट के बीच विकास और स्थिरता का संतुलन कैसे कायम रखा जाता है।

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