भारत के स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक (17 ) शहीद किशन सिंह गर्गज– लेखिक संपादक राम प्रकाश वत्स
“फरवरी 1926 में ब्रिटिश सरकार ने शहीद किशन सिंह गर्गज को फांसी की सज़ा सुनाई। मृत्यु के फंदे को चूमते समय उनके चेहरे पर न भय था, न पश्चाताप—केवल मातृभूमि के लिए बलिदान का गर्व था। हंसते-हंसते उन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और अमर शहीदों की पंक्ति में सदा के लिए स्थापित हो गए।”
भारत माता के वीर सपूत: शहीद किशन सिंह गर्गज और बब्बर अकाली आंदोलनभारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल अहिंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें ऐसे अनगिनत क्रांतिकारी भी हुए जिन्होंने सशस्त्र संघर्ष को अपना मार्ग बनाकर औपनिवेशिक सत्ता को सीधी चुनौती दी। पंजाब की धरती विशेष रूप से ऐसे जांबाज़ सपूतों की जननी रही है। इन्हीं महान क्रांतिकारियों में एक नाम शहीद किशन सिंह गर्गज (1886–1926) का है, जिन्होंने अपने जीवन को देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वे 1920 के दशक के उग्र बब्बर अकाली आंदोलन के संस्थापक नेताओं में अग्रणी थे और उनका बलिदान पंजाब के क्रांतिकारी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
प्रारंभिक जीवन और देशभक्ति की चेतना :किशन सिंह गर्गज का जन्म वर्ष 1886 में पंजाब के जालंधर क्षेत्र में हुआ। उनका परिवार सिख परंपराओं, शौर्य और आत्मसम्मान की भावना से ओत-प्रोत था। युवावस्था में वे ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए, जहाँ उन्होंने अंग्रेजी शासन की कार्यप्रणाली, उसकी क्रूरता और भारतीयों के प्रति भेदभाव को निकट से देखा। सेना में रहते हुए ही उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति असंतोष पनपने लगा। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वयं को पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया।
अकाली आंदोलन से बब्बर अकाली तक: बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में गुरुद्वारों को महंतों और अंग्रेज समर्थकों के कब्ज़े से मुक्त कराने के लिए अकाली आंदोलन प्रारंभ हुआ। किशन सिंह गर्गज भी इस आंदोलन से जुड़े। किंतु 1921 के नानकाना साहिब नरसंहार ने उनके विचारों को निर्णायक मोड़ दिया। इस जघन्य हत्याकांड में सैकड़ों निहत्थे सिखों को बेरहमी से मार दिया गया। इस घटना ने किशन सिंह को यह विश्वास दिला दिया कि केवल अहिंसक आंदोलन से अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देना पर्याप्त नहीं है।
जब अकाली नेतृत्व का मुख्य धड़ा अहिंसक नीति पर अडिग रहा, तब किशन सिंह गर्गज ने क्रांतिकारी मार्ग चुना। इसी विचारधारा से 1921–22 के बीच ‘बब्बर अकाली जत्था’ का गठन हुआ, जो ब्रिटिश शासन और उसके मुखबिरों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध में विश्वास रखता था।‘
गर्गज’ नाम और क्रांतिकारी व्यक्तित्व :किशन सिंह की बुलंद आवाज़, निर्भीक वक्तृत्व और सिंहनाद जैसी गर्जना के कारण उनके साथी उन्हें प्रेम और सम्मान से ‘गर्गज’ कहने लगे। उनका व्यक्तित्व युवाओं को प्रेरित करता था। वे मानते थे कि गुलामी के विरुद्ध संघर्ष केवल भाषणों से नहीं, बल्कि त्याग और बलिदान से जीता जाता है।
उग्र विचारधारा और संघर्ष का मार्ग:-बब्बर अकाली आंदोलन का उद्देश्य स्पष्ट था—ब्रिटिश सरकार की जड़ों को हिलाना, उनके विश्वासपात्रों और मुखबिरों को समाप्त करना तथा पंजाब में औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकना। यह आंदोलन गुप्त रूप से कार्य करता था और इसकी गतिविधियाँ अत्यंत संगठित थीं। अंग्रेजी सरकार के लिए यह आंदोलन गंभीर चुनौती बन गया।‘
बब्बर अकाली दोआबा’ :अखबार की भूमिकाक्रांति को जन-जन तक पहुँचाने के लिए किशन सिंह गर्गज और उनके साथियों ने ‘बब्बर अकाली दोआबा’ नामक एक गुप्त अखबार निकाला। यह अखबार जालंधर और होशियारपुर क्षेत्र में वितरित किया जाता था। इसमें अंग्रेजों के अत्याचार, गुरुद्वारों की दुर्दशा और भारतीयों के शोषण को उजागर किया जाता था। यह पत्र ब्रिटिश सरकार की आंखों में खटकने लगा और आंदोलन को वैचारिक मजबूती देने का सशक्त माध्यम बना।
ब्रिटिश दमन, गिरफ्तारी और मुकदमा:ब्रिटिश सरकार ने 1923 में बब्बर अकाली आंदोलन को गैरकानूनी घोषित कर दिया। व्यापक तलाशी अभियान चलाए गए, मुखबिर तंत्र सक्रिय किया गया और अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। अंततः किशन सिंह गर्गज भी पकड़े गए। उन पर राजद्रोह और हिंसक गतिविधियों के आरोप लगाए गए। मुकदमा औपनिवेशिक कानूनों के तहत चलाया गया, जहाँ न्याय की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी।
शहादत और अमर विरासत:फरवरी 1926 में ब्रिटिश सरकार ने शहीद किशन सिंह गर्गज को फांसी की सज़ा सुनाई। मृत्यु के फंदे को चूमते समय उनके चेहरे पर न भय था, न पश्चाताप—केवल मातृभूमि के लिए बलिदान का गर्व था। हंसते-हंसते उन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और अमर शहीदों की पंक्ति में सदा के लिए स्थापित हो गए।”
स्वतंत्र सैनानी किशन सिंह गर्गज केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि उस चेतना के प्रतीक थे जो अन्याय के विरुद्ध सिर उठाकर खड़ी होती है। बब्बर अकाली आंदोलन भले ही सीमित समय तक चला, लेकिन उसका प्रभाव गहरा और दूरगामी रहा। उनका सर्वोच्च बलिदान यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं, बल्कि त्याग और साहस से प्राप्त होती है। भारत माता का यह वीर सपूत सदैव राष्ट्र की स्मृति में अमर रहेगा।

