Editorial articles on current events मुख्यकार्यालय भरमाड़(ज्वाली) संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश पिछले तीन वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहा है। 2023 से लेकर 2025 तक के मॉनसून में भारी वर्षा, भूस्खलन और बाढ़ ने राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले बुनियादी ढांचे, कृषि-बागवानी और पर्यटन क्षेत्र को गहरा आघात पहुंचाया है। । अनुमानित रूप से लगभग 17 हजार करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान हुआ है। ऐसे कठिन समय में विश्व बैंक द्वारा 24.5 करोड़ डॉलर (करीब 1992 करोड़ रुपये) का ऋण स्वीकृत किया जाना निस्संदेह राहत का संकेत है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या यह ऋण हिमाचल की अर्थव्यवस्था को वास्तव में पटरी पर ला सकेगा?
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि यह राशि कुल नुकसान की तुलना में सीमित है। यदि 17 हजार करोड़ रुपये के नुकसान के सापेक्ष 1992 करोड़ रुपये की सहायता को देखें तो यह कुल क्षति का एक छोटा अंश है। अतः यह ऋण संपूर्ण पुनर्निर्माण का समाधान नहीं, बल्कि पुनरुत्थान की प्रक्रिया का प्रारंभिक पूंजीगत आधार है।
विश्व बैंक की इस सहायता का मुख्य उद्देश्य मजबूत और जलवायु-लचीला (क्लाइमेट रेजिलिएंट) बुनियादी ढांचा तैयार करना तथा सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों के माध्यम से स्थानीय रोजगार सृजन को प्रोत्साहन देना है। यदि यह राशि सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं, स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों के पुनर्निर्माण में वैज्ञानिक योजना के तहत निवेश की जाती है, तो इसका गुणक प्रभाव (Multiplier Effect) राज्य की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक पड़ सकता है। निर्माण कार्यों से स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, बाजारों की गतिविधि तेज होगी और पर्यटन पुनः गति पकड़ सकेगा।
विशेष रूप से सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों में निवेश का पहलू महत्वपूर्ण है। हिमाचल की अर्थव्यवस्था कृषि, बागवानी और लघु उद्योगों पर आधारित है। यदि सेब उत्पादकों, दुग्ध समितियों और स्वयं सहायता समूहों को संगठित कर मूल्य संवर्धन (Value Addition) की दिशा में कार्य किया जाए, तो ग्रामीण आय में स्थायी वृद्धि संभव है। इससे पलायन की समस्या भी कम हो सकती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकती है।
हालांकि, ऋण का अर्थ भविष्य की देनदारी भी है। पहले से वित्तीय दबाव झेल रहे हिमाचल के लिए यह आवश्यक है कि इस राशि का उपयोग अत्यंत पारदर्शी और परिणामोन्मुखी ढंग से किया जाए। यदि धनराशि केवल अस्थायी मरम्मत या प्रशासनिक खर्च में व्यय हो गई, तो यह अवसर व्यर्थ हो जाएगा और कर्ज का बोझ बढ़ेगा।
राज्य सरकार को इस ऋण को दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों से जोड़ना होगा—जैसे आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ शहरी नियोजन, पहाड़ी क्षेत्रों के अनुरूप निर्माण मानक, और पर्यावरण-संतुलित विकास नीति। साथ ही, केंद्र सरकार से लंबित सहायता की प्राप्ति और राजस्व सृजन के वैकल्पिक स्रोतों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
निष्कर्षतः, विश्व बैंक का 1992 करोड़ रुपये का ऋण हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हो सकता है, बशर्ते इसे दूरदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और जनभागीदारी के साथ लागू किया जाए। यह सहायता सम्पूर्ण समाधान नहीं, बल्कि आर्थिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब यह राज्य की नीतिगत प्राथमिकताओं और क्रियान्वयन क्षमता पर निर्भर करेगा कि आपदा को अवसर में किस हद तक बदला जा सके।

