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स्क्रीन टाइम से ग्रीन टाइम की ओर बढ़ने का आह्वान/डिजिटल पिंजरे से निकलकर कुदरत की गोद में लौटने की जरूर

RamParkash Vats
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1-20-20-20 नियम के तहत हर 20 मिनट स्क्रीन देखने के बाद 20 फीट दूर किसी पौधे या हरियाली को 20 सेकंड तक देखना आंखों के लिए लाभकारी है।


डिजिटल युग में जहां जीवन की शुरुआत सूरज की किरणों से नहीं बल्कि स्मार्टफोन की ब्लू लाइट से हो रही है, वहीं प्रकृति से बढ़ती दूरी मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ता आदर्श अवस्थी ने ‘स्क्रीन टाइम से ग्रीन टाइम तक’ विषय पर जागरूकता लेख के माध्यम से समाज को प्रकृति से जुड़ने का संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि आज एक औसत व्यक्ति दिन के 7 से 8 घंटे मोबाइल, लैपटॉप या अन्य डिजिटल स्क्रीन पर बिता रहा है। इसके दुष्परिणाम केवल शारीरिक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रहे हैं। गर्दन दर्द, आंखों में जलन, अनिद्रा के साथ-साथ सोशल मीडिया के कारण तुलना की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे तनाव, चिड़चिड़ापन और अकेलापन पैदा हो रहा है।
आदर्श अवस्थी ने बताया कि ‘ग्रीन टाइम’ केवल पार्क घूमने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ पांचों इंद्रियों का जुड़ाव है। हरियाली, ताजी हवा और खुले वातावरण में समय बिताने से तनाव हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है।


1-20-20-20 नियम के तहत हर 20 मिनट स्क्रीन देखने के बाद 20 फीट दूर किसी पौधे या हरियाली को 20 सेकंड तक देखना आंखों के लिए लाभकारी है।
बच्चों के लिए ग्रीन ऑवर तय कर उन्हें गैजेट्स से दूर रखकर मिट्टी, धूप और पेड़ों से जोड़ना चाहिए।
डिजिटल उपवास के रूप में प्रतिदिन कम से कम एक घंटा नो-गैजेट ज़ोन बनाकर परिवार और प्रकृति के साथ समय बिताना जरूरी है।

इसके साथ ही नंगे पैर घास पर चलना और डूबते सूरज को निहारना प्राकृतिक उपचार के रूप में लाभदायक बताया गया।
अंत में उन्होंने कहा कि तकनीक को छोड़ना समाधान नहीं है, बल्कि उसे अनुशासित करना समय की मांग है। डिजिटल प्रगति जरूरी है, लेकिन प्रकृति से कटाव विनाशकारी साबित हो सकता है। प्रकृति के साथ बिताया गया समय ही सच्ची और स्थायी शांति का मार्ग है।

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