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हिमालय का सरकता बाजूद: प्रकृति, विकास और चेतावनी

RamParkash Vats
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हिमालय केवल पर्वतों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक रीढ़ है। यही पर्वत शृंखला उत्तर भारत को जल, जलवायु और जीवन प्रदान करती है। लेकिन आज यही हिमालय “सरकते बाजू” की तरह खिसक रहा है—भूगर्भीय रूप से भी और प्रतीकात्मक रूप से भी। भूस्खलन, ग्लेशियर पिघलना, बादल फटना, सड़कें धंसना और गांवों का उजड़ना इस बात के संकेत हैं कि हिमालय अब चेतावनी दे रहा है। सवाल यह है कि क्या हम इस चेतावनी को सुनने को तैयार हैं?
भूवैज्ञानिक दृष्टि से हिमालय एक युवा पर्वत श्रृंखला है, जो आज भी हर वर्ष कुछ मिलीमीटर की दर से ऊपर उठ रही है। भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से बना यह क्षेत्र स्वभाव से ही संवेदनशील है। ऐसे में जब अंधाधुंध निर्माण, सुरंगें, चौड़ी सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएं और अनियंत्रित खनन इस नाजुक संतुलन को और छेड़ते हैं, तो परिणाम विनाशकारी होना तय है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में बार-बार हुए भूस्खलन और आपदाएं इसी असंतुलन का परिणाम हैं।
हिमाचल प्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण बन चुका है। कभी “देवभूमि” कहलाने वाला यह शांत पर्वतीय राज्य अब हर मानसून में आपदा का पर्याय बनता जा रहा है। सड़कें बह जाती हैं, पुल टूट जाते हैं, पहाड़ दरक जाते हैं और गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। 2023 और 2024 की बारिश ने यह साफ कर दिया कि हिमालयी राज्यों की विकास नीति प्रकृति के अनुकूल नहीं रही। सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल प्राकृतिक आपदा है, या मानव-निर्मित त्रासदी?
विकास की अंधी दौड़ में हिमालय को एक संसाधन मात्र समझ लिया गया। पहाड़ काटे गए, जंगल साफ किए गए और नदियों को सुरंगों में कैद कर दिया गया। चार-लेन और छह-लेन सड़कों के नाम पर पहाड़ों का सीना छलनी किया गया, जबकि वैकल्पिक और टिकाऊ परिवहन मॉडल पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ। पहाड़ों में वही मॉडल थोप दिया गया जो मैदानी इलाकों के लिए उपयुक्त है। परिणामस्वरूप, हर कटान के साथ पहाड़ कमजोर होता गया और हर बारिश में उसका “बाजू” और अधिक सरकता चला गया।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि यही रफ्तार रही तो आने वाले दशकों में कई छोटे ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इसका सीधा असर नदियों के जलप्रवाह, कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन पर पड़ेगा। मानसून का स्वरूप भी बदल चुका है—कम दिनों में अत्यधिक वर्षा अब सामान्य होती जा रही है। यही कारण है कि बादल फटना और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नीति निर्माण में स्थानीय ज्ञान और चेतावनियों को अक्सर नजरअंदाज किया गया। पहाड़ों में रहने वाले लोग पीढ़ियों से जानते हैं कि कहां निर्माण सुरक्षित है और कहां नहीं। लेकिन विकास योजनाओं में उनकी आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को औपचारिकता बना दिया गया और परियोजनाओं को “राष्ट्रीय हित” के नाम पर मंजूरी मिलती गई। जब आपदा आती है, तब जिम्मेदारी प्रकृति पर डाल दी जाती है।
हिमालय का सरकता बाजू केवल भौतिक संकट नहीं है, यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। हर आपदा के बाद हजारों लोग विस्थापित होते हैं। पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है। युवा रोजगार की तलाश में पलायन को मजबूर होते हैं। गांव खाली होते जा रहे हैं और पहाड़ों की सामाजिक संरचना टूट रही है। यह एक मूक आपदा है, जो धीरे-धीरे हिमालयी समाज को भीतर से खोखला कर रही है।
अब समय आ गया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि नीति के रूप में अपनाया जाए। हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल की आवश्यकता है—ऐसा मॉडल जो भूगर्भीय संवेदनशीलता, जलवायु जोखिम और स्थानीय जरूरतों को केंद्र में रखे। छोटे पैमाने की परियोजनाएं, स्थानीय सामग्री से निर्माण, ढलान के अनुरूप इंजीनियरिंग और हरित आवरण की रक्षा इस दिशा में जरूरी कदम हैं। सड़कें जरूरी हैं, लेकिन पहाड़ों को काटकर नहीं, बल्कि उनके साथ सामंजस्य बनाकर।साथ ही, राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही आवश्यक है। अल्पकालिक लाभ और चुनावी घोषणाओं से ऊपर उठकर दीर्घकालिक सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। हिमालय को बचाने का अर्थ केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करना है जो इन पर्वतों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर हैं।
अंततः हिमालय का सरकता बाजूद एक चेतावनी है—कि यदि हमने अब भी नहीं सीखा, तो यह सरकन केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगी। यह हमारी नीतियों, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे भविष्य को भी खिसका देगी। हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है। प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व ही एकमात्र रास्ता है। यदि यह समझ समय रहते नहीं आई, तो इतिहास गवाह होगा कि हमने चेतावनी को देखा, महसूस किया—लेकिन सुना नहीं।

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