Reading: धारावाहिक (41) भारत के स्वतंत्र सैनानी:1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानायक जनरल बख्त खान ने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ मातृभूमि की आज़ादी हेतु जीवन समर्पित किया।

धारावाहिक (41) भारत के स्वतंत्र सैनानी:1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानायक जनरल बख्त खान ने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ मातृभूमि की आज़ादी हेतु जीवन समर्पित किया।

RamParkash Vats
3 Min Read

ऐसे वीर सेनानियों के बलिदान और संघर्ष की बदौलत ही आज हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं।

भारत माता के स्वतंत्र सैनानी जनरल बख्त खान को कोटि -कोटि नमन न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स

भारतभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए भारत माँ के अनेक वीर सपूतों ने अंग्रेजों की नौकरी, सुख-सुविधा और अपना सब कुछ त्याग कर मातृभूमि की आज़ादी के लिए जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे ही महान क्रांतिकारी सेनानियों में एक नाम था जनरल बख्त खान का।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह ज्वालामुखी था जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। इस महान विद्रोह में जनरल बख्त खान ने अपनी अद्भुत वीरता, नेतृत्व क्षमता और सैन्य कौशल का परिचय दिया। उनका जन्म 1797 में हुआ था और उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में तोपखाना सूबेदार के रूप में सेवा की। परंतु जब देश में स्वतंत्रता की ज्वाला भड़की तो उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी को ठुकरा कर मातृभूमि की सेवा का मार्ग चुना।
मई 1857 में जब विद्रोह की आग पूरे उत्तर भारत में फैल रही थी, तब बख्त खान बरेली के क्रांतिकारी सैनिकों के साथ दिल्ली पहुँचे। वहाँ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने उनकी वीरता और सैन्य अनुभव को देखते हुए उन्हें विद्रोही सेना का मुख्य सेनापति नियुक्त किया और “साहिब-ए-आलम” की उपाधि प्रदान की।

जनरल बख्त खान केवल एक बहादुर योद्धा ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी प्रशासक भी थे। उन्होंने दिल्ली में एक प्रशासनिक परिषद या ‘दरबार’ की स्थापना की, जो सैन्य और नागरिक प्रशासन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए जिम्मेदार थी। उनका उद्देश्य केवल युद्ध करना ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र शासन की व्यवस्था स्थापित करना भी था।
दिल्ली की रक्षा के लिए उन्होंने अंग्रेजी सेना के विरुद्ध कई मोर्चों पर वीरतापूर्वक युद्ध किया। उनके पास अंग्रेजी सेना में लंबे अनुभव के कारण उनकी रणनीतियों की गहरी समझ थी। यही कारण था कि उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।

सितंबर 1857 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया, तब भी बख्त खान ने हार नहीं मानी। वे संघर्ष जारी रखते हुए अंततः नेपाल की ओर चले गए, जहाँ 1859 में उनका निधन हुआ।
जनरल बख्त खान का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही होता है जो व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है। उन्होंने अंग्रेजों की सुरक्षित नौकरी को ठुकराकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का मार्ग चुना और इतिहास में अमर हो गए।
ऐसे वीर सेनानियों के बलिदान और संघर्ष की बदौलत ही आज हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। 🇮🇳

Share This Article
Leave a comment
error: Content is protected !!