भारत क देश -विदेश के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि- कोटि नमन, संपादक राम प्रकाश बत्स
भारत माता की गुलामी का दर्द इतना गहरा था कि उसे केवल भारत में रहने वाले ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले देशभक्त भी सहन नहीं कर पा रहे थे। ऐसी ही महान वीरांगना थीं मैडम भीकाजी कामा, जिन्होंने परदेस की धरती पर रहते हुए भी भारत की आज़ादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और असहनीय कष्ट सहते हुए राष्ट्र सेवा में स्वयं को न्यौछावर कर दिया।

24 सितंबर 1861 को मुंबई के एक समृद्ध पारसी परिवार में जन्मी मैडम भीकाजी कामा बचपन से ही तेजस्वी और राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत थीं। उन्होंने एलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन में शिक्षा प्राप्त की। कम उम्र से ही उनमें अन्याय और दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस था। जब भारत पर अंग्रेजी शासन का अत्याचार बढ़ता गया, तब उनके भीतर भी स्वतंत्रता की लौ प्रज्वलित हो उठी।
सन् 1902 में स्वास्थ्य उपचार के लिए वह लंदन गईं, जहाँ उनकी मुलाकात महान राष्ट्रवादी नेता दादाभाई नौरोजी से हुई। उनके साथ काम करते हुए उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ बुलंद करनी शुरू कर दी।
इतिहास का वह गौरवशाली क्षण 22 अगस्त 1907 को आया, जब स्टटगार्ट (जर्मनी) में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेशी धरती पर पहली बार भारत का तिरंगा झंडा फहराया। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक साहसिक और प्रेरणादायक अध्याय बन गई।

उन्होंने विदेशों में रहते हुए पत्रकारिता को भी स्वतंत्रता संग्राम का हथियार बनाया। पेरिस से प्रकाशित “वंदे मातरम्” और बर्लिन से निकलने वाले “मदन तलवार” जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों का खुलकर विरोध किया और विश्व समुदाय को भारत की पीड़ा से अवगत कराया।
लगभग 30 वर्षों तक निर्वासन का जीवन जीने के बाद वह भारत लौटीं। 13 अगस्त 1936 को बॉम्बे में उनका निधन हो गया। उनके अद्वितीय योगदान के सम्मान में भारतीय तटरक्षक बल ने 1997 में अपने एक पोत का नाम ICGS Bhikaji Cama रखा।
मैडम भीकाजी कामा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि सच्चा देशभक्त कहीं भी रहे, उसके हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता की ज्वाला सदैव प्रज्ज्वलित रहती है। उनका बलिदान आज भी देशवासियों को राष्ट्रसेवा और देशभक्ति की प्रेरणा देता है।

