भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन,भारत के स्वाभिमानी स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक संपादकीय लेख संपादक राम प्रकाश बत्स
भारत की पवित्र भूमि सदैव वीरों और वीरांगनाओं की जननी रही है। इस मिट्टी ने ऐसे अनगिनत सपूत और सपूतियां जन्म दिए जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल पुरुषों की वीरता से ही नहीं, बल्कि महिलाओं के अद्भुत साहस, त्याग और बलिदान से भी गौरवान्वित है। ऐसी ही महान वीरांगना थीं Begum Hazrat Mahal, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अदम्य साहस और नेतृत्व का परिचय देकर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।

सन् 1820 में अवध प्रांत के फैजाबाद जिले में एक अत्यंत साधारण और गरीब परिवार में उनका जन्म हुआ। बचपन में उनका नाम मुहम्मदी खातून था। गरीबी और कठिन परिस्थितियों के कारण उनका बचपन संघर्षों में बीता, परंतु नियति ने उन्हें इतिहास के महान पन्नों में अमर करने का मार्ग तैयार कर रखा था। बाद में वे अवध के नवाब Wajid Ali Shah की बेगम बनीं और उन्हें “हजरत महल” की उपाधि प्राप्त हुई। उनके पुत्र Birjis Qadr का जन्म हुआ, जो आगे चलकर अवध के सिंहासन के उत्तराधिकारी बने।
सन् 1856 में जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर कब्जा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को बंदी बना लिया, तब बेगम हजरत महल ने अद्वितीय साहस का परिचय देते हुए अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को सिंहासन पर बैठाया और स्वयं अवध की सत्ता संभाली। सन् Indian Rebellion of 1857 के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया।
बेगम हजरत महल केवल एक शासक ही नहीं बल्कि कुशल सेनानायक और रणनीतिकार भी थीं। वे स्वयं युद्धभूमि में उतरकर अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाती थीं। उनकी सेना में महिलाओं का एक विशेष सैनिक दल भी शामिल था, जो उनकी शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक था। वे सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखती थीं और उनकी सेना में हिन्दू-मुस्लिम सभी सैनिकों को बराबरी का सम्मान प्राप्त था। यही कारण था कि अवध की जनता और अनेक राजाओं ने उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया।

उनके नेतृत्व में लखनऊ के निकट चिनहट और दिलकुशा की लड़ाइयों में अंग्रेजी सेना को करारी हार का सामना करना पड़ा। गोंडा, फैजाबाद, सुल्तानपुर, बहराइच, सीतापुर और सलोन जैसे क्षेत्रों को अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त कर लिया गया और लखनऊ पर पुनः स्वाधीनता का ध्वज फहराया गया। इस संघर्ष में महान क्रांतिकारी Nana Sahib सहित कई भारतीय राजाओं ने भी उनका साथ दिया।
कहा जाता है कि वे हाथी पर सवार होकर अपनी सेना का नेतृत्व करती थीं और उनके साहस से अंग्रेजी सेना भयभीत हो उठती थी। हालांकि अंग्रेजों ने भारी सैन्य शक्ति और हथियारों के बल पर पुनः आक्रमण किया और धीरे-धीरे लखनऊ तथा अवध के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा कर लिया। परिस्थितियां प्रतिकूल होने पर भी बेगम हजरत महल ने हार नहीं मानी और गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से अंग्रेजों को चुनौती देती रहीं।
अंततः जब संघर्ष अत्यंत कठिन हो गया और उनके सहयोगी भी कम होते गए, तब उन्हें अपने पुत्र के साथ नेपाल जाना पड़ा। नेपाल के शासक Jung Bahadur Rana ने उनके साहस और स्वाभिमान से प्रभावित होकर उन्हें शरण दी। वहीं काठमांडू में सन् 1879 में इस महान वीरांगना ने अंतिम सांस ली, परंतु उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।
बेगम हजरत महल का जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब मातृभूमि की रक्षा का प्रश्न हो, तब स्त्री-पुरुष का भेद समाप्त हो जाता है। उनका साहस, त्याग और मातृभूमि की रक्षा में नारी शक्ति का अद्वितीय बलिदान: बेगम हजरत महल आज भी भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान इस सत्य को सिद्ध करता है कि भारत की आजादी केवल तलवारों से नहीं, बल्कि असंख्य वीरांगनाओं के बलिदान से भी प्राप्त हुई है।

