Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats
भारत में नशीले पदार्थों का बढ़ता कारोबार आज केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक गहराता हुआ राष्ट्रीय संकट बन चुका है। देश के लगभग हर कोने से नशे की बड़ी खेपों की बरामदगी यह संकेत देती है कि यह खतरा अब सीमित क्षेत्रों तक नहीं रहा। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक नशे की जड़ें गहराई से फैल चुकी हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस अंधकार का सबसे पहला शिकार देश का युवा और किशोर वर्ग बन रहा है, जो किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। नशा आज व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।
नशे के दुष्परिणाम समाज के हर स्तर पर दिखाई दे रहे हैं। युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में फंसकर अपराध की राह पर बढ़ रही है—चोरी, लूट, हिंसा और यहां तक कि जघन्य अपराधों तक। हाल के मामलों में किशोरों द्वारा यह स्वीकार किया जाना कि अपराध केवल नशे के लिए पैसे जुटाने हेतु किए गए, पूरे समाज को झकझोर देता है। इसके साथ नकली दवाइयों और घातक कफ सिरप का बढ़ता प्रचलन एक और भयावह तस्वीर पेश करता है, जिसमें मासूम बच्चों तक की जान जा रही है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि नशा सामाजिक, नैतिक और मानवीय मूल्यों को भीतर से खोखला कर रहा है।तीसरा
नशीले पदार्थों का व्यापार अब संगठित और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का रूप ले चुका है। सीमा पार से ड्रोन के जरिए तस्करी, समुद्री मार्गों का दुरुपयोग और राज्यों की सीमाओं से गुजरता अवैध कारोबार राष्ट्रीय सुरक्षा तक के लिए खतरा बन गया है। यह तथ्य कि देश में बरामद होने वाली हेरोइन का बड़ा हिस्सा सीमावर्ती राज्यों से पकड़ा जाता है, बताता है कि यह तंत्र कितना गहरा और सुनियोजित है। चंडीगढ़ में सात राज्यों के अधिकारियों का संयुक्त सम्मेलन इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जो यह स्वीकार करता है कि यह लड़ाई किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है।
अब आवश्यकता है कठोर और समन्वित कार्रवाई की। केवल छापेमारी या अस्थायी अभियानों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं। नशे और नकली दवाइयों के कारोबार के विरुद्ध कानूनों को और सख्त बनाना तथा उनका बिना किसी समझौते के क्रियान्वयन सुनिश्चित करना अनिवार्य है। साथ ही, यह भी समझना होगा कि नशे की गिरफ्त में आए लोग केवल अपराधी नहीं, बल्कि पीड़ित भी हैं। प्रभावी नशामुक्ति, पुनर्वास, काउंसलिंग और रोजगार के अवसर दिए बिना इस दुष्चक्र को तोड़ा नहीं जा सकता।
यह समय चेतावनी का है। यदि आज राष्ट्र ने नशे की इस महामारी को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी। सरकार, न्याय व्यवस्था, समाज, परिवार और स्वयं युवा—सबको मिलकर इस लड़ाई को राष्ट्रीय संकल्प बनाना होगा। नशे के खिलाफ संघर्ष केवल नीति या कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा, उसकी युवा शक्ति और उसके भविष्य की रक्षा का प्रश्न है। नशे का बढ़ता व्यापार भारत के युवाओं के लिए अंधकार का द्वार है—और इसे बंद करना आज की सबसे बड़ी राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।

