दुखद सच्चाई यह है कि नियम हमेशा घटना के बाद याद आते हैं, पहले नहीं। यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
हिमाचल प्रदेश में बार-बार हो रहे बस हादसे किसी दुर्भाग्यपूर्ण संयोग का नहीं, बल्कि सरकार, विभाग और पूरी व्यवस्था की सामूहिक लापरवाही का परिणाम हैं। यह एक कटु यथार्थ है कि हमारे यहां कानून और नियम पहले से मौजूद होते हैं, लेकिन उनकी याद तब आती है जब कोई बड़ा हादसा हो जाए, निर्दोष जानें चली जाएं और व्यवस्था कटघरे में खड़ी दिखाई दे।प्रदेश में अधिकांश बस दुर्घटनाओं की जड़ वाहनों का समुचित रखरखाव न होना है।

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एचआरटीसी हो या निजी बसें, बड़ी संख्या में वाहन तकनीकी रूप से जर्जर अवस्था में सड़कों पर दौड़ रहे हैं। बाहरी रंग-रोगन से इनकी वास्तविक हालत छिपा ली जाती है, लेकिन अंदर से ये बसें कब जवाब दे दें, इसका कोई भरोसा नहीं। पहाड़ी और खतरनाक मोड़ों वाले रास्तों पर चलने वाली ऐसी बसें यात्रियों के लिए सचमुच “मौत का ताबूत” बन चुकी हैं। सबसे बड़ा और असहज करने वाला प्रश्न यह है कि सरकारी बसों के चालान आखिर क्यों नहीं होते? क्या कानून केवल निजी बसों और चालकों के लिए है? निजी हो या सरकारी, दोनों का उद्देश्य एक ही है—प्रदेश की जनता को सुरक्षित और सुचारु परिवहन सुविधा देना। नियम भी समान हैं और कानून भी एक है, फिर व्यवहार में यह दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है? इस पूरी व्यवस्था में सबसे कमजोर कड़ी चालक बन जाता है। सरकारी हो या निजी, चालक मजबूरी में जर्जर बसों को रूट पर उतारने को विवश होता है। हादसा होने पर सारा दोष उसी के सिर मढ़ दिया जाता है, जबकि बस मालिक या विभागीय अधिकारी अक्सर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। निर्दोष चालक या तो अपनी जान गंवा देता है या फिर कानूनी कार्रवाई का शिकार हो जाता है—यह व्यवस्था की सबसे दर्दनाक विडंबना है। हरिपुरधार जैसे बड़े हादसों के बाद प्रशासन अचानक सक्रिय होता है। ओवरस्पीड, ओवरलोडिंग, तकनीकी खामियों और नशे में ड्राइविंग पर सख्ती के निर्देश जारी होते हैं। लेकिन ये नियम तो पहले से मौजूद थे। प्रश्न यह नहीं कि नियम क्या हैं, प्रश्न यह है कि उनका पालन हादसे से पहले क्यों नहीं कराया जाता?
संपादकीय दृष्टिकोण
आवश्यकता दिखावटी अभियानों की नहीं, बल्कि सतत और निष्पक्ष कार्रवाई की है। बसों की फिटनेस, ब्रेक सिस्टम और सुरक्षा उपकरणों की नियमित व ईमानदार जांच हो। बस मालिकों और विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। नशे में वाहन चलाने वाले चालकों को दोबारा स्टीयरिंग सौंपने की अनुमति न मिले—चाहे वे सरकारी हों या निजी।जब तक जिम्मेदारी केवल चालक तक सीमित रहेगी और व्यवस्था स्वयं को हर बार निर्दोष मानती रहेगी, तब तक पहाड़ों की सड़कों पर बहता खून सत्ता और सिस्टम से एक कठोर सवाल करता रहेगा—क्या नियम केवल हादसों के बाद याद करने के लिए बने हैं?

