अंकित शर्मा की यह उपलब्धि स्पष्ट करती है कि लगन, धैर्य और निरंतर प्रयास अंततः सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। सात बार प्रयास करना आसान नहीं होता—हर असफलता मनोबल तोड़ सकती है, लेकिन अंकित ने उसे सीख में बदला। उन्होंने यह सिद्ध किया कि परिस्थितियां या संसाधनों की सीमाएं नहीं, बल्कि लक्ष्य के प्रति समर्पण ही निर्णायक होता है
अंकित शर्मा के पिता सुरेश कुमार शर्मा डाक विभाग में पोस्ट मास्टर के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि उनकी माता सरला शर्मा गृहिणी हैं। उनके भाई अंकुश शर्मा एमबीए हैं और वर्तमान में चंडीगढ़ स्थित एक कोचिंग संस्थान में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं।
छोटे कस्बे सिद्धपुरघाड़ से निकलकर हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा में पांचवां रैंक प्राप्त करना, उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो बार-बार की असफलताओं से निराश हो जाते हैं। माता-पिता का संस्कार, भाई का मार्गदर्शन और गुरुओं का आशीर्वाद—इन सबका सम्मान करते हुए अंकित ने सामूहिक सहयोग की शक्ति को भी रेखांकित किया है। यह सफलता अकेले की नहीं, पूरे परिवार और समाज की जीत है।
अंकित ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, भाई और गुरूजनों को देते हुए कहा कि उनके निरंतर मार्गदर्शन, समर्थन और विश्वास ने ही उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया। उन्होंने बताया कि एचएएस की मुख्य परीक्षा यह उनका सातवां प्रयास था, जबकि इससे पूर्व वे दो बार साक्षात्कार में शामिल हो चुके थे।
शिमला में रहकर कठिन परिश्रम, विषय में गहरी पकड़ और संतुलित जीवनशैली—किताबें पढ़ने व क्रिकेट जैसे शौक—ने उनकी तैयारी को मजबूती दी। उनका सफर बताता है कि सपने तब सच होते हैं जब मेहनत उनसे बड़ी हो। अंकित की कहानी युवाओं को यह विश्वास देती है कि हार अंतिम नहीं होती; सही दिशा, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ किया गया प्रयास अवश्य रंग लाता है।

