(Jawali. Dr. N.K. Sharma) उपमंडल जवाली के अंतर्गत टियुकरी गांव स्थित राधा-कृष्ण एवं शिव मंदिर परिसर में 12 दिसंबर से 20 दिसंबर तक आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के सातवें दिन भक्तिमय वातावरण बना रहा। कथा के दौरान कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी देवी-देवता की आराधना यदि संकल्प के साथ करनी हो, तो उसे सदैव किसी पूर्ण गुरु के सानिध्य में ही करना चाहिए। उन्होंने बताया कि बिना संकल्प के की गई साधना में भी गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक होता है, क्योंकि अज्ञानवश किए गए कर्मों का प्रतिफल कई बार व्यक्ति को भोगना पड़ता है
कथावाचक ने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुए कहा कि ऋषि विश्वामित्र को दिए गए वचन के कारण राजा होते हुए भी उन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े, किंतु उन्होंने सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। इससे यह शिक्षा मिलती है कि गुरु, सत्य और संकल्प जीवन के मूल आधार हैं।
आयोजकों ने बताया कि प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक कथापाठ तथा सायं 7 बजे संध्या वंदन का आयोजन किया जा रहा है। कथा का समापन 20 दिसंबर को होगा। इस दिन प्रातः 8 बजे हवन-यज्ञ, इसके उपरांत 11 बजे से 1 बजे तक अंतिम कथा तथा बाद में प्रसाद वितरण किया जाएगा। कथा में क्षेत्र के बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जी उदाहरण देते हुए कहा कि राजा हरिश्चंद्र भारतीय संस्कृति में सत्य, त्याग और धर्म के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं। वे सूर्यवंशी राजा थे और अपने सत्यव्रत के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध थे। उनके जीवन की कथा यह संदेश देती है कि सत्य के मार्ग पर चलना कठिन अवश्य है, पर अंततः वही विजय दिलाता है।
एक बार ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने यज्ञ के लिए दान में संपूर्ण राज्य मांग लिया। राजा ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना राज्य दान कर दिया। राज्य दान करने के बाद भी विश्वामित्र ने उनसे दक्षिणा की मांग की। दक्षिणा देने के लिए राजा को अपनी पत्नी रानी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व को बेचने तक का कष्ट सहना पड़ा। अंततः वे स्वयं काशी के श्मशान घाट में चांडाल के यहां सेवक बन गए।
श्मशान में राजा का कार्य शवों से कर वसूलना था। उसी समय दैवयोग से रानी शैव्या अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का शव लेकर वहीं पहुंचीं। श्मशान के नियमों के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने अपनी ही पत्नी से कर मांगा। पति-पत्नी दोनों ने एक-दूसरे को पहचानते हुए भी धर्म और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं हुए। यह दृश्य अत्यंत करुण और हृदय विदारक था।
राजा हरिश्चंद्र की इस कठोर परीक्षा से देवता भी द्रवित हो उठे। अंत में ऋषि विश्वामित्र ने प्रकट होकर राजा की परीक्षा समाप्त की। देवताओं ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें उनका राज्य, परिवार और सम्मान पुनः लौटा दिया तथा उन्हें अमर यश प्रदान किया।
राजा हरिश्चंद्र की कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही कष्ट क्यों न सहे, अंततः सत्य की ही विजय होती है। यही कारण है कि आज भी राजा हरिश्चंद्र का नाम सत्य और त्याग का पर्याय माना जाता है।

