नशे के खिलाफ हिमाचल की निर्णायक जंग*हिमाचल प्रदेश आज केवल एक कानून-व्यवस्था की चुनौती से नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। चिट्टा जैसे घातक नशीले पदार्थों ने पहाड़ी शांति, पारिवारिक संरचना और सबसे बढ़कर युवाओं के भविष्य पर सीधा प्रहार किया है। यह संकट इतना गहरा है कि इसे केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित रखना आत्मघाती होगा। इसी सच्चाई को समझते हुए राज्य सरकार ने नशे के खिलाफ जंग को महज प्रशासनिक अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया है।

मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं इस अभियान की निगरानी करना इस बात का संकेत है कि सरकार इसे प्राथमिकता के शीर्ष पर रखती है। पुलिस को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि छोटे तस्करों तक सीमित न रहकर पूरे नेटवर्क—आपूर्ति श्रृंखला, फाइनेंसर और संरक्षण देने वालों—को ध्वस्त किया जाए। हाल के महीनों में बढ़ी गिरफ्तारियां, संपत्ति जब्ती और अंतर-जिला समन्वय इस बदले हुए रुख को दर्शाते हैं। यह स्पष्ट संदेश है कि नशे के कारोबार में शामिल किसी भी व्यक्ति के लिए हिमाचल सुरक्षित पनाहगाह नहीं रहेगा।
लेकिन सख्ती का यह रास्ता तभी सार्थक होगा, जब इसे संवेदनशीलता का साथ मिले। नशे का शिकार हुआ युवा अपराधी से पहले एक भटका हुआ नागरिक है। पुनर्वास केंद्रों की क्षमता बढ़ाना, काउंसलिंग, कौशल विकास और रोजगार से जोड़ना—ये कदम कानून की कठोरता को मानवीय स्पर्श देते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान, माता-पिता की भागीदारी और पंचायत स्तर पर निगरानी तंत्र इस लड़ाई की रीढ़ बन सकते हैं।
पुलिस–जनसहभागिता इस अभियान का निर्णायक मोड़ है। जब समाज चुप रहता है, तब नशे का धंधा फलता-फूलता है। सूचना देने वालों की सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान सुनिश्चित कर सरकार भरोसे की नींव रख सकती है। स्वयंसेवी संगठनों, युवाओं के समूहों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं की भूमिका यहां अहम है—वे नैतिक दबाव और सामाजिक अनुशासन दोनों पैदा कर सकते हैं।
हिमाचल का युवा आज एक चौराहे पर खड़ा है—एक रास्ता नशे की अंधी गली की ओर जाता है, दूसरा शिक्षा, खेल, कौशल और उद्यमिता की खुली सड़क की ओर। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह दूसरे रास्ते को आकर्षक, सुलभ और सम्मानजनक बनाए। खेल अवसंरचना, स्टार्टअप समर्थन, ग्रामीण रोजगार और सांस्कृतिक गतिविधियाँ युवाओं को विकल्प देती हैं—और विकल्प ही नशे का सबसे बड़ा प्रतिरोध हैं।
अंततः, नशे के खिलाफ यह जंग अकेले सरकार नहीं जीत सकती। कानून का डंडा जरूरी है, पर समाज का कंधा उससे भी अधिक। जब सख्ती, संवेदना और सहभागिता एक साथ चलें, तभी परिणाम टिकाऊ होते हैं। हिमाचल के लिए संदेश स्पष्ट है—कानून + समाज = समाधान। यही सूत्र इस पहाड़ी राज्य के भविष्य को सुरक्षित कर सकता है।,

