SHIMLA/17/12/2025/SCB VIJAY SAMYAL
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीशों को देय घरेलू सहायता राशि और टेलीफोन खर्च के भुगतान के मामले में अदालत को गुमराह करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए वित्त सचिव को दंडित करने का निर्णय लिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया एवं न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अधिकारी द्वारा जानबूझकर ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए गए, जिनका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के पालन से बचना था। अदालत ने माना कि वित्त विभाग ने भुगतान में अनावश्यक देरी कर न्यायिक आदेशों की अवहेलना की है, जो न केवल अनुचित है बल्कि न्यायपालिका की गरिमा के भी विपरीत है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि अब अदालत के पास संबंधित अधिकारी को दंडित करने के अलावा कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचा है, क्योंकि यह मामला साधारण प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई अवहेलना का प्रतीत होता है।
अदालत के इस सख्त रुख के बाद महाधिवक्ता ने निवेदन किया कि दंडात्मक आदेश को अगली सुनवाई की तारीख तक स्थगित किया जाए। इस पर खंडपीठ ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की विधवाओं तक को बकाया राशि से वंचित रखा जा रहा है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। फिर भी, अदालत ने न्यायहित में महाधिवक्ता के निवेदन को सशर्त स्वीकार किया। कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि अगली तारीख तक सरकार द्वारा ठोस आश्वासन पूरा नहीं किया गया, तो वित्त सचिव के विरुद्ध दंडात्मक आदेश स्वतः लागू हो जाएगा। खंडपीठ ने यह भी संकेत दिया कि न्यायालय इस मामले को केवल औपचारिक आश्वासनों के आधार पर लंबित रखने के पक्ष में नहीं है और वास्तविक अनुपालन ही एकमात्र कसौटी होगी।
सुनवाई के दौरान प्रधान सचिव (वित्त) देवेश कुमार व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित हुए और उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए दलील दी कि बकाया भुगतान से संबंधित प्रस्ताव 2 दिसंबर 2025 को भेजा गया था, जिस पर 5 दिसंबर 2025 को सैद्धांतिक सहमति दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि यह मामला हिमाचल प्रदेश सरकार की कार्यवाही नियमावली और कार्यालय मैनुअल, 2011 के तहत मंत्रिपरिषद के समक्ष निर्णय के लिए लंबित है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) द्वारा दायर हलफनामे के विपरीत पाया, जिसमें यह कहा गया था कि मंत्रिपरिषद पहले ही मुख्यमंत्री को विभागीय फाइल पर निर्णय लेने के लिए अधिकृत कर चुकी है। ऐसे में खंडपीठ ने सवाल उठाया कि जब निर्णय की शक्ति स्पष्ट रूप से निहित है, तो बकाया भुगतान में देरी का कोई वैध कारण कैसे हो सकता है।
कोर्ट ने मामले के व्यापक परिप्रेक्ष्य में वित्त विभाग की भूमिका पर भी विस्तार से टिप्पणी की। जनहित याचिका से जुड़े हलफनामों से यह तथ्य सामने आया कि हाईकोर्ट एवं अधीनस्थ न्यायपालिका से प्राप्त 224 प्रस्तावों में से 154 को वित्त विभाग ने मंजूरी दी, जबकि 29 को अनुपयुक्त मानते हुए अस्वीकार किया गया और 39 प्रस्तावों को अतिरिक्त जानकारी के लिए लौटाया गया। वित्त विभाग ने विभिन्न मदों में 108.70 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि को भी स्वीकृति दी है, जिसमें 37 नए न्यायालयों की स्थापना और सहायक पदों के सृजन का प्रस्ताव शामिल है। इसके बावजूद, खंडपीठ ने कहा कि 13 नवंबर 2025 के आदेश के तहत एक सप्ताह में न्यायालयों के गठन संबंधी निर्देशों के अनुपालन में स्पष्ट समय-सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है। अदालत ने निर्देश दिए कि वाहनों की मंजूरी, लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च असिस्टेंट के पदों तथा अन्य लंबित प्रस्तावों पर स्पष्ट और सत्यापित विवरण प्रस्तुत किया जाए। इसके साथ ही रजिस्ट्रार जनरल को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे वित्त सचिव के हलफनामे में किए गए कथनों का सत्यापन करते हुए विस्तृत जवाब दाखिल करें, ताकि न्यायालय के समक्ष तथ्यात्मक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सके।

