भरमाड 8 अगस्त 2026,मुख्य कार्यालय न्यूज़ डैक्स संपादक राम प्रकाश

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय चुनौतियों को लेकर मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू का ताजा बयान केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि केंद्र–राज्य संबंधों पर उठता एक बड़ा राजनीतिक सवाल है। 16वें वित्त आयोग में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) की समाप्ति को लेकर मुख्यमंत्री ने जिस तरह इसे “जनता के अधिकारों” से जोड़ा है, उससे साफ है कि कांग्रेस सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की रणनीति पर काम कर रही है

मुख्यमंत्री का यह कहना कि आरडीजी का लगभग 12.7 प्रतिशत हिस्सा राज्य के बजट का आधार रहा है, केंद्र सरकार की नीतियों पर परोक्ष हमला माना जा रहा है। पहाड़ी और सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए इस अनुदान का समाप्त होना आर्थिक झटका ही नहीं, बल्कि राजनीतिक असंतुलन का संकेत भी देता है। कांग्रेस इसे “सौतेला व्यवहार” करार देकर भाजपा नेतृत्व वाले केंद्र को कटघरे में खड़ा कर रही है।
जीएसटी लागू होने के बाद कराधान अधिकारों में कमी का मुद्दा उठाकर मुख्यमंत्री ने एक बार फिर संघीय ढांचे में राज्यों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। यह तर्क न केवल हिमाचल बल्कि अन्य गैर-औद्योगिक राज्यों की पीड़ा को भी स्वर देता है, जिसे कांग्रेस भविष्य में राष्ट्रीय राजनीति में भुनाने की कोशिश कर सकती है।

सुक्खू का यह दावा कि यह लड़ाई राजनीतिक नहीं है, स्वयं में एक राजनीतिक संदेश छुपाए हुए है। जनता के हक, संसाधन और भविष्य की सुरक्षा की बात कर राज्य सरकार खुद को हिमाचल के हितों का एकमात्र रक्षक बताने का प्रयास कर रही है। वहीं, विपक्ष इस पूरे मुद्दे को राज्य सरकार की वित्तीय विफलताओं से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दे सकता है।
कुल मिलाकर, आरडीजी का सवाल अब केवल आर्थिक नहीं रहा। यह हिमाचल की राजनीति में केंद्र बनाम राज्य, अधिकार बनाम जिम्मेदारी और सत्ता बनाम संवेदनशीलता की बहस को और तेज करने वाला मुद्दा बनता जा रहा है, जिसके राजनीतिक नतीजे आने वाले समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे।

