भरमाड़, 08 फरबरी 2026,मुख्य कार्यालय हिमाचल न्यूज़ डैक्स,राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश की राजनीति इन दिनों असमंजस, आरोप-प्रत्यारोप और आशंकाओं के दौर से गुजर रही है। सत्ता और विपक्ष के बीच शब्दों के तीखे बाण इस कदर चल रहे हैं कि असल मुद्दे—प्रदेश की अर्थव्यवस्था, जनहित और विकास—हाशिये पर खिसकते दिख रहे हैं।
कांग्रेस सरकार और भाजपा आमने-सामने हैं, और इस टकराव का केंद्र बन गया है आरजीडी (RGD) का मुद्दा। कांग्रेस इसे भाजपा को घेरने का औजार बना रही है, जबकि भाजपा इसे सरकार की विफलताओं से ध्यान भटकाने की रणनीति बता रही है। नतीजा यह है कि प्रदेश में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है, लेकिन जनता के सामने समाधान के बजाय केवल आरोपों की सूची रखी जा रही है।
इस सियासी संघर्ष की जड़ में हिमाचल की कमजोर होती आर्थिक सेहत भी है। बीते करीब 50 वर्षों से प्रदेश की अर्थव्यवस्था कर्ज के बोझ तले दबती चली गई है। आज हालात यह हैं कि केंद्र सरकार की सहायता के बिना राज्य की वित्तीय गाड़ी पटरी पर संतुलन नहीं बना पा रही। विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस सरकार इस सच्चाई को स्वीकारने के बजाय जनता को भ्रमित कर रही है, जबकि सरकार इसे पूर्ववर्ती नीतियों की विरासत बता रही है। सच जो भी हो, आर्थिक संकट से जूझ रही जनता के लिए यह सियासी रस्साकशी राहत नहीं, बल्कि चिंता बढ़ाने वाली है।
इसी बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल के बयान ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। उनका दावा कि आने वाले 5–6 महीनों में प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव तय है, केवल एक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि सत्ता पर सीधी चुनौती है। कांग्रेस सरकार को “झूठ के सहारे बनी” बताना और “झूठ की दुकान” जैसे शब्दों का प्रयोग राजनीतिक मर्यादा से अधिक भावनात्मक आक्रोश को दर्शाता है। हालांकि, यह भी सच है कि ऐसे बयान तभी असर डालते हैं जब जनता में असंतोष की जमीन पहले से मौजूद हो।
डॉ. बिंदल ने पूर्व कर्मचारियों की पेंशन और अन्य लंबित मुद्दों को लेकर सरकार की संवेदनहीनता का आरोप लगाया है। यदि वास्तव में एक बड़ा वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है, तो यह सरकार के लिए चेतावनी है। लोकतंत्र में सत्ता केवल बहुमत से नहीं, बल्कि जनविश्वास से चलती है। जब यह विश्वास डगमगाने लगता है, तब बदलाव की बातें हवा में नहीं, जमीन पर सुनाई देने लगती हैं।
आरजीडी मुद्दे पर भाजपा का यह कहना कि सरकार अपनी विफलताओं का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ रही है, राजनीतिक रूप से सुविधाजनक तर्क हो सकता है, लेकिन इससे प्रदेश का हित साधित नहीं होता। “नाच न जाने आंगन टेढ़ा” जैसी कहावतें सुर्खियां तो बनाती हैं, पर समाधान नहीं देतीं। कांग्रेस और भाजपा—दोनों को यह समझना होगा कि निरंतर टकराव से न तो आर्थिक संकट सुलझेगा और न ही जनता का भरोसा लौटेगा।
अंततः, सवाल यह कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था, दिशा परिवर्तन का है। यदि राजनीति का केंद्र जनता की समस्याएं, आर्थिक सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही नहीं बना, तो चाहे सरकार बदले या न बदले, हिमाचल की चुनौतियां जस की तस रहेंगी। प्रदेश की राजनीति आज एक मोड़ पर खड़ी है—जहां से या तो जिम्मेदार नेतृत्व की राह चुनी जा सकती है, या फिर आरोप-प्रत्यारोप के इस अंतहीन चक्र में जनता को और थकाया जा सकता है। निर्णय जनता करेगी, लेकिन जिम्मेदारी राजनीति को निभानी होगी।

