फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की स्थिति पिछले डेढ़ दशक से लगातार कमजोर होती गई है। वर्ष 2008 से लेकर अब तक के विधानसभा चुनावों पर दृष्टि डालें तो यह साफ दिखाई देता है कि मतों का ग्राफ निरंतर गिरा है और उसका सीधा परिणाम चुनावी हार के रूप में सामने आया है। यह गिरावट किसी एक कारण का नतीजा नहीं, बल्कि संगठनात्मक शिथिलता, स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा और आंतरिक कलह की लंबी श्रृंखला का परिणाम है।
भाजपा, जो स्वयं को अनुशासित और कैडर आधारित पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है, फतेहपुर में उसी मूल पहचान से भटकती नजर आती है। सबसे बड़ा आरोप यही है कि पार्टी लंबे समय से फतेहपुर में असंगठित रही है। स्थानीय मुद्दों, कार्यकर्ताओं की भावनाओं और जमीनी सच्चाइयों की बार-बार अनदेखी की गई। संगठन को मजबूत करने के बजाय, ऊपर से थोपे गए निर्णयों ने कार्यकर्ताओं में असंतोष को जन्म दिया।आंतरिक विरोध भाजपा के लिए फतेहपुर में सबसे घातक सिद्ध हुआ है। गुटबाजी और आपसी खींचतान के चलते सक्रिय कार्यकर्ता बंटते चले गए। चुनाव के समय यही बिखराव पार्टी को भारी पड़ा। जो कार्यकर्ता कभी बूथ स्तर पर पार्टी की रीढ़ हुआ करते थे, वही या तो निष्क्रिय हो गए या फिर खुलकर मन से प्रचार नहीं कर पाए। परिणामस्वरूप, भाजपा को बार-बार हार का स्वाद चखना पड़ा।
फतेहपुर में भाजपा हाईकमान की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है। स्थानीय सक्रिय नेताओं की राजनीतिक समझ, सामाजिक पकड़ और क्षेत्रीय समीकरणों को समझने में पार्टी नेतृत्व नाकाम रहा। बार-बार ऐसा देखा गया कि स्थानीय नेताओं को प्राथमिकता देने के बजाय “चौंकाने वाले” प्रत्याशी मैदान में उतार दिए गए। ऐसे प्रत्याशी, जिनका न तो क्षेत्र से गहरा जुड़ाव रहा और न ही जनता के बीच स्वीकार्यता। स्वाभाविक है कि अब फतेहपुर सीट जीतना भाजपा के लिए आसान नहीं रहा।इसके उलट, कांग्रेस ने जमीनी राजनीति पर पकड़ मजबूत की है। फतेहपुर विधानसभा से कांग्रेस प्रत्याशी सामूहिक जनहित की योजनाओं को प्राथमिकता देते हुए धरातल पर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि जनता के बीच कांग्रेस की स्वीकार्यता बनी हुई है और भाजपा की रणनीति लगातार कमजोर पड़ती जा रही है।
हाल ही में फतेहपुर की ग्राम पंचायत बरोट में भाजपा के सक्रिय नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठक ने इस असंतोष को खुलकर सामने ला दिया। बैठक में “धरती पुत्र” का नारा गूंजा। स्पष्ट संदेश दिया गया कि यदि भाजपा फतेहपुर विधानसभा में जीत का परचम लहराना चाहती है, तो उसे स्थानीय, जमीन से जुड़े व्यक्ति को प्रत्याशी बनाना होगा। “अबकी बार धरतीपुत्र” केवल नारा नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा के खिलाफ कार्यकर्ताओं की सामूहिक आवाज है। भाजपा हाईकमान से साफ शब्दों में अनुरोध किया गया कि टिकट ऐसे व्यक्ति को दिया जाए, जो फतेहपुर की मिट्टी, समाज और समस्याओं को जानता हो।
फतेहपुर की सियासत का इतिहास भी बताता है कि यहां मजबूत स्थानीय नेतृत्व ही चुनावी मुकाबले को रोचक और प्रभावशाली बनाता रहा है। स्वर्गीय सुजान सिंह पठानिया और राजन सुशांत के बीच चुनावी दंगल लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति का केंद्र रहा। राजन सुशांत जैसे नेता कांग्रेस के लिए बराबर की टक्कर देते थे और मुकाबला सीधा जनता के बीच होता था। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि फतेहपुर में चेहरा नहीं, बल्कि जमीनी पकड़ मायने रखती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में अभी लगभग दो वर्ष का समय शेष है। यह अवधि किसी भी संभावित प्रत्याशी के लिए अत्यंत संवेदनशील होती है। यही वह समय होता है जब जनता के बीच पैठ बनाई जाती है, संगठन को जोड़ा जाता है और भरोसे की नींव रखी जाती है। यदि भाजपा ने इस समय को भी गंवाया, तो भविष्य और कठिन हो सकता है।
सीमांकन के बाद नूरपुर विधानसभा का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा फतेहपुर में शामिल हुआ। इस क्षेत्र पर राकेश पठानिया का खासा प्रभाव रहा है, जिसका असर पूर्व चुनावों में भी देखने को मिला। यह तथ्य बताता है कि फतेहपुर की राजनीति अब पहले से कहीं अधिक जटिल हो चुकी है, जहां क्षेत्रीय प्रभाव और जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं।जाति समीकरण भी फतेहपुर विधानसभा के चुनावों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इन समीकरणों को नजरअंदाज कर कोई भी पार्टी सफलता की उम्मीद नहीं कर सकती। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अंदर ही अंदर सुलग रही असंतोष की चिंगारी को कैसे शांत करे और बिखरे कार्यकर्ताओं को एकजुट करे।
बरोट में स्वर्ण सिंह राणा के आवास पर हुई बैठक में लगभग 200 कार्यकर्ताओं की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि संगठन में अभी भी ऊर्जा और संभावनाएं शेष हैं। पूर्व ओबीसी अध्यक्ष ओपी चौधरी, भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश अध्यक्ष मदन सिंह राणा, किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष पंकज शर्मा (हैपी), जिला महामंत्री कुलदीप डोगरा सहित अनेक नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि यदि भाजपा सही दिशा में निर्णय ले, तो तस्वीर बदली जा सकती है।अंततः फतेहपुर में भाजपा की जीत या हार का प्रश्न केवल एक सीट का नहीं, बल्कि पार्टी की राजनीतिक समझ, संगठनात्मक इच्छाशक्ति और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसे की परीक्षा है। यदि हाईकमान ने अब भी “धरतीपुत्र” की आवाज नहीं सुनी, तो फतेहपुर में भाजपा की सियासी जमीन और अधिक खिसक सकती है।

