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कांग्रेस की अंदरूनी जंग: क्या जवाली में राजनीतिक आत्मघात की ओर बढ़ रही है पार्टी…..?

RamParkash Vats
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सांकेतिक चित्र

जवाली में कांग्रेस का ‘राजनीतिक युद्ध’: नीरज भारती और दिलावर छोटू आमने-सामने
व्यक्तिगत आरोपों से गरमाई जवाली की राजनीति, कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें
प्रेस कॉन्फ्रेंस से पलटवार तक: जवाली में कांग्रेस नेताओं की जुबानी जंग तेज

EDITOR RAM PARKASH VATS

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में मतभेद और गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सार्वजनिक मंचों पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाए, तो यह केवल नेताओं की छवि को ही नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक दल की साख को प्रभावित करती है। इन दिनों जवाली विधानसभा क्षेत्र में पूर्व विधायक नीरज भारती और पूर्व ओबीसी अध्यक्ष दिलावर सिंह छोटू के बीच चल रहा राजनीतिक संघर्ष इसी प्रकार की स्थिति को जन्म देता दिखाई दे रहा है। यह संघर्ष अब वैचारिक या राजनीतिक मुद्दों की सीमाओं को लांघकर व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सार्वजनिक आबरू तक पहुंच गया है, जो किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत को समझना आवश्यक है। पूर्व विधायक नीरज भारती ने कांग्रेस सरकार और संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं की अनदेखी तथा नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी का मुद्दा उठाया। उनका आरोप रहा कि जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा और सरकार तक उनकी शिकायतें नहीं पहुंच पा रही हैं। यह मुद्दा अपने आप में राजनीतिक रूप से गंभीर था, क्योंकि किसी भी दल की ताकत उसका संगठन और कार्यकर्ता ही होते हैं। जब कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें, तो असंतोष का उभरना स्वाभाविक हो जाता है।

नीरज भारती ने इस विषय को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोला। समय के साथ यह विरोध मुखर होता गया और सार्वजनिक बयानों के माध्यम से राजनीतिक दबाव की रणनीति का रूप लेने लगा। लेकिन इसी बीच इस विवाद में नया मोड़ तब आया, जब पूर्व ओबीसी अध्यक्ष दिलावर सिंह छोटू ने मीडिया में प्रेस वार्ता कर नीरज भारती और एक मंत्री पर व्यक्तिगत आरोप लगाए। यहीं से राजनीतिक बहस मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत आरोपों की दिशा में मुड़ती दिखाई दी।

राजनीतिक संवाद में मतभेद सामान्य हैं, लेकिन जब बहस नीति, विचार और जनहित से हटकर निजी आरोपों में बदलने लगे, तो उसके परिणाम व्यापक होते हैं। नीरज भारती ने भी दिलावर सिंह छोटू की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जवाब मीडिया में दिया और फिर आरोपों की नई श्रृंखला शुरू हो गई। इसके बाद जवाबी प्रेस कॉन्फ्रेंसों का सिलसिला तेज हो गया। दोनों पक्षों के बीच यह टकराव अब मीडिया के माध्यम से चलने वाले “राजनीतिक परमाणु युद्ध” जैसा प्रतीत हो रहा है, जिसमें शब्दों के हथियारों से राजनीतिक मर्यादाएं लगातार क्षतिग्रस्त होती नजर आ रही हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस पूरे विवाद का लाभ किसे मिलेगा? क्या यह संघर्ष किसी राजनीतिक समाधान की ओर बढ़ रहा है, या केवल आत्मघाती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनकर रह जाएगा? राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो इस प्रकार की सार्वजनिक लड़ाई का सीधा नुकसान कांग्रेस को ही हो सकता है, विशेषकर जवाली जैसे विधानसभा क्षेत्र में, जहां संगठनात्मक एकजुटता पहले से ही चुनौतीपूर्ण रही है। जब पार्टी के वरिष्ठ चेहरे सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की आलोचना और व्यक्तिगत हमलों में व्यस्त हों, तो विपक्ष को राजनीतिक अवसर स्वतः मिल जाते हैं।

कांग्रेस के भीतर जो अंतर्कलह सार्वजनिक रूप से सामने आ रही है, वह पार्टी कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति भी पैदा कर सकती है। कार्यकर्ता यह समझने में असमर्थ हो सकते हैं कि वे किस नेतृत्व के साथ खड़े हों और पार्टी की वास्तविक प्राथमिकता क्या है। ऐसे समय में जब विधानसभा चुनावों में दो वर्ष से भी कम समय शेष है, कांग्रेस के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से जोखिमपूर्ण कही जा सकती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि नीरज भारती द्वारा उठाया गया मूल मुद्दा पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता। यदि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और संगठनात्मक असंतोष जैसी बातें वास्तविकता का हिस्सा हैं, तो पार्टी नेतृत्व को उन्हें गंभीरता से सुनना चाहिए। लेकिन किसी भी वैध मुद्दे की प्रभावशीलता तब कमजोर पड़ जाती है, जब उसका प्रस्तुतीकरण व्यक्तिगत हमलों और सार्वजनिक टकराव में बदल जाए। इससे मूल विषय पीछे छूट जाता है और ध्यान विवादों पर केंद्रित हो जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों और कांग्रेस समर्थकों की राय भी यही संकेत देती है कि पार्टी को आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक मंचों की बजाय संगठनात्मक ढांचे के भीतर हल करने की आवश्यकता है। जनता आज नेताओं के निजी विवादों से अधिक महंगाई, बेरोजगारी, विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण चाहती है। यदि राजनीतिक विमर्श व्यक्तिगत संघर्ष तक सीमित रह जाए, तो जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

अंततः जवाली की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। यदि कांग्रेस नेतृत्व समय रहते हस्तक्षेप कर संवाद और संतुलन स्थापित नहीं करता, तो यह विवाद केवल दो नेताओं के बीच का संघर्ष न रहकर पूरे संगठन की राजनीतिक कमजोरी का कारण बन सकता है। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन उसकी मर्यादा और दिशा जनहित केंद्रित होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई में परिवर्तित।राजनीति में शब्दों के युद्ध अक्सर चुनावी परिणामों तक असर छोड़ते हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह इस “अंदरूनी राजनीतिक युद्ध” को नियंत्रित कर जनता के मुद्दों की ओर लौट पाए या नहीं।

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