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संपादकीय:भूमि का क्रंदन: अस्थिर होते हिमालय और हमारी विकास-भ्रमित दृष्टि

RamParkash Vats
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हिमालय केवल पर्वतमाला नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनरेखा है—जलवायु का प्रहरी, नदियों का उद्गम, और करोड़ों लोगों की सांसों का आधार। परन्तु आज यह युवा, भूवैज्ञानिक रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखला लगातार खतरे में है। वैज्ञानिक तथ्य स्पष्ट बताते हैं कि हिमालय की चट्टानें ढीली, मिट्टी असंगठित और जल-निकासी प्रणाली कमजोर है, जिसके कारण भारी वर्षा का मात्र कुछ घंटों का दबाव भी पहाड़ों को भूस्खलन की ओर धकेल देता है। परंतु वास्तविक चिंता की जड़ प्राकृतिक नहीं—बल्कि मानवीय गतिविधियाँ हैं। सरकारी नीतियों, अनियोजित विकास और हमारी लालसाओं ने इस प्राकृतिक अस्थिरता को आपदा में बदल दिया है। यह विडंबना ही है कि जो पर्वत करोड़ों वर्षों की भूवैज्ञानिक प्रक्रिया से बने, हम उन्हें कुछ वर्षों के लालची विकास में गर्त में धकेल रहे हैं।

*नदियों का बढ़ता भू-कटाव हिमालयी पारिस्थितिकी की सबसे बड़ी चेतावनियों में से एक है। तटों पर अवैज्ञानिक निर्माण, सड़कें, होटल, और जलधाराओं के मार्ग में हस्तक्षेप ने नदियों को नया, अनियंत्रित आयाम दे दिया है। वहीं दूसरी ओर, पेड़ों का अंधाधुंध कटान पहाड़ों की रीढ़ को तोड़ रहा है। जंगल जब सिकुड़ते हैं तो मिट्टी की पकड़ ढीली होती है, ढलानों की स्थिरता कम होती है और पहाड़ों की देह भीतर से खोखली हो जाती है। यह केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की नींव को हिलाने वाली मानवीय भूल है। प्रकृति ने पौधों की जड़ों में वह शक्ति दी है जो पर्वतों को जोड़कर रखती है; और हम उसी शक्ति को कुल्हाड़ी के एक प्रहार में समाप्त कर देते हैं।

*अवैध खनन इस संकट में आग में घी का काम कर रहा है। हिमाचल के अनेक संवेदनशील क्षेत्रों में पहाड़ों को भीतर से खोखला किया जा रहा है—मिट्टी, पत्थर और रेत के अवैध व्यापार ने पर्वतों के पेट में ऐसी दरारें डाल दी हैं जिन्हें भरने में प्रकृति को शायद सदियों का समय लगे। मशीनों की निरंतर चोट ने पहाड़ों की संरचना को तोड़ा, कंपन ने धरातल को कमजोर किया, और खनन माफियाओं ने इस विनाश को लाभ का सौदा बना दिया। इसी के साथ पहाड़ों पर बढ़ते भवनों का बेतहाशा बोझ—शिमला, सोलन, धर्मशाला, कसोल जैसे शहर—पहाड़ों की सहनशक्ति को समाप्त कर रहा है। ये क्षेत्र इतने संवेदनशील हो चुके हैं कि मामूली छेड़छाड़ भी विशाल भूस्खलन में बदल जाती है। एक बार यदि मिट्टी खिसकनी शुरू हो जाए, तो पूरा पहाड़ धीरे-धीरे ढह जाता है—जैसे प्रकृति अपने ही बोझ से टूट रही हो।

*भूमि का क्रंदन केवल चेतावनी नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। जो मिट्टी एक पर्वत पर बनने में लाखों वर्ष लेती है, उसे हम एक सड़क निर्माण या एक होटल की खुदाई में कुछ घंटों में नष्ट कर देते हैं। समाधान स्पष्ट है—विकास रोकना नहीं, बल्कि उसे वैज्ञानिक एवं संतुलित बनाना। संवेदनशील भूभागों का वैज्ञानिक आकलन, भवन निर्माण पर कड़े मानक, नदी तटीय क्षेत्रों में निर्माण पर पूर्ण रोक, अवैध खनन पर शून्य सहिष्णुता, व्यापक पुनर्वनीकरण, तथा पहाड़ी शहरों में निर्माण घनत्व पर कठोर नियंत्रण—ये कदम केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता हैं। आज हिमालय हमसे संवाद करना चाहता है; उसका हर भूस्खलन, हर दरार और हर टूटती पहाड़ी हमें चेतावनी दे रही है कि अब भी समय है। यदि हमने इस पुकार को नहीं सुना, तो अगली आपदा मानव की नहीं—प्रकृति की होगी, और उसका प्रहार कहीं अधिक कठोर होगा।

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